ख़िरशू से देवलगढ़ व धारी देवी की यात्रा

मेरी केदारनाथ यात्रा
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देवलगढ़ मंदिर व धारा देवी मंदिर

गौरा देवी टेम्पल , देवलगढ़ (उत्तराखंड )

01 मई 2018, बुधवार

खिरसू से देवलगढ़ मंदिर तक की दूरी लगभग 18 किलोमीटर है इतनी दूरी कि आप अपनी सवारी से लगभग तीस से चालिस मिनटों में पूरी कर सकते है। और लगभग इतनी ही दूरी श्रीनगर से भी है। जैसे ही हम ख़िरसू से निकले एक महिला ने हमसे लिफ्ट मांगी। उसको श्रीनगर जाना था अपनी बिटिया से मिलने। उसकी बेटी उधर ही पढ़ रही है। हमने बताया कि हम देवलगढ़ जा रहे है उसने कहा कोई बात नही आप देवलगढ़ वाले तिराहे पर उतार देना। उसने बताया कि उसका पति ख़िरसू GMVN गेस्ट हाउस में ही कार्य करता है। उसके तीन बच्चे है एक लड़की दिल्ली में जॉब करती है। बेटा देहरादून में पढ़ रहा है और एक बिटिया श्रीनगर में पढ़ रही है। जिससे वो आज मिलने जा रही है। कुछ ही मिनटों में हमने उसे तिराहे पर छोड़ दिया। और हम बांये तरफ मुड़ गए। यही रास्ता देवलगढ़ जाता है और आगे धारी देवी के पास कल्यासोड़ में मैन रोड पर मिल जाता है। रास्ते में एक गांव का नाम था मंडोली। मैं भी दिल्ली के एक गांव मंडोली से ही हूं। लेकिन यह हमारे गांव की तरफ प्रदुषित नही था। दिल्ली व एनसीआर आज बहुत प्रदुषित हो चुके है। लेकिन इधर ही हवा स्वच्छ थी लेकिन हम इधर रुके नही। फिर आगे देवलगढ़ ही जाकर रुके। हम लगभग सुबह के 9:40 पर इधर पहुँच गए थे।

देवलगढ़ मंदिरों का एक समूह है यहां पर कई मंदिर है मुख्य यहां पर राजराजेश्वरी मंदिर, गोरा देवी मंदिर, काल भैरव का मंदिर व गुफा है। गुफा जो नीचे सड़क के पास ही है। पुराने समय में उत्तराखंड 52 छोटे-छोटे गढ़ो(रियासतों) में बटा हुआ था। इसलिए इसे गढ़वाल भी कहा जाता है। राजा अजय पाल जी ने इन 52 गढ़ो में से 48 गढ़ों को जीतकर अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से बदलकर देवलगढ़ में बनाई लेकिन फिर 6 वर्षों बाद उन्होंने अपनी नई राजधानी अलकनंदा नदी के किनारे श्रीनगर में बसाई बनाई। वैसे वह गर्मियों में देवलगढ़ रहते थे। और सर्दियों में श्रीनगर।

राज राजेश्वरी मंदिर मंदिर का निर्माण 15 वी शताब्दी में राजा अजय पाल के शासनकाल में कराया गया यह तीन मंजिला मंदिर है, तीसरी मंजिल पर ही मुख्य मंदिर है। यहां पर माता की स्वर्ण मूर्ति व कुछ अन्य प्रतिमाएं भी रखी गई है। यहां पर महाकाली यंत्र, मां कामख्या यंत्र, महालक्ष्मी यंत्र, बगलामुखी यंत्र व श्रीयंत्र भी रखे हुए है। और यहां पर इनकी विशेष पूजा होती है। यहां पर कई सालों से अखंड जोत भी जलती आ रही है। राजराजेश्वरी को शाही परिवार (राज परिवार) व ब्राह्मणों की कुलदेवी माना गया है। इनको तारा देवी, भैरवी, त्रिपुर सुंदरी, धूमावती व मातंगी के नाम से भी जाना जाता है। यह ऐश्वर्य व मोक्ष देने वाली देवी हैं।

गौरा देवी मंदिर भी एक प्राचीन मंदिर है। लेकिन यह तब बना जब यहां पर राजराजेश्वरी मंदिर की स्थापना हो चुकी थी। चूंकि राजराजेश्वरी राजपरिवार की कुलदेवी थी। इसलिए प्रजा के लिए भी गौरा देवी का मंदिर बनवाया गया। गोरा देवी जी को गिरिजा देवी(पार्वती) जी भी कहा जाता है। और यह आसपास के गांव की कुलदेवी है। इनकी बहुत मान्यता है। आज भी वैशाखी के दिन यहां पर बहुत बड़ा मेला लगता है।
राजा का चबूतरा नाम से एक जगह और इधर बनी है कहते है कि इस जगह पर राजा अजय पाल सिंह जी बैठते थे और न्याय करते थे। इसी पर पाली भाषा में कुछ लिखा भी गया है कहते है कि यह उनके न्याय की की कहानियां हैं। मंदिर मुख्य मार्ग से थोड़ा सा ऊपर बना है मंदिर तक जाने के लिए भी दो रास्ते हैं। दोनों ही एक दूसरे के विपरीत बने हैं। मैंने आगे वाले रास्ते से जाना तय किया क्योंकि यह थोड़ा नजदीक था। हम तकरीबन थोड़ा ही ऊपर पहुंचे थे। कि एक पुराना मंदिर हमें देखने को मिला यह गोरा देवी का मंदिर था। यह मंदिर भी आदि शंकराचार्य द्वारा जी के द्वारा ही जीर्णोद्धार किया गया है। यह लगभग केदारनाथ जैसी शैली में ही बना है। मैं इस शैली का नाम तो नहीं जानता कि यह कौन सी शैली में बना है लेकिन लगभग देखने में वही पत्थर वही, चिनाई उसी मुद्रा में खड़ा हुआ है जैसा केदारनाथ। गोरा देवी मंदिर के बाएं तरफ एक छोटा सा मंदिर है शायद वो किसी द्वारपाल का मंदिर होगा और एक उससे थोड़ा सा बड़ा मंदिर थोड़ा सा नीचे दाएं तरफ है इसमें गरुड़ पर बैठे भगवान विष्णु ही हैं। इन मंदिरों को देखकर हम थोड़ा ऊपर चल पड़े थोड़ा सा ऊपर चलने के चलते ही बाएं हाथ पर एक चबूतरा बना हुआ है। उसी के पास एक कुआं है, कुआं थोड़ा ऊपर है। और अब टूट-फूट भी चुका है। इसलिए हम उधर नहीं गए। हम केवल राजा के चबूतरे तक ही गये। यहां से थोड़ा आगे चलकर राजराजेश्वरी मंदिर आ जाता है। थोड़ी सीढ़िया चढ़नी होती है। यहां हमारे अलावा कोई नहीं दिख रहा था। इधर बहुत शांति थी। हवा का शोर गीत गाता सा प्रतीत हो रहा था। पेड़ो के पत्तों की आवाज जो एक दूसरे से टकराने पर बन रही थी। वह भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। थोड़ा आगे चले थे कि एक घर दिखा। उसमें आवाज लगा कर हमने पूछा कि मंदिर कहां पर है? तो उधर से एक पंडित जी आए। मुझे नाम तो पता नही पर शायद नौटियाल जी थे । यह यहां के मुख्य पुजारी है। यह हमें मंदिर के ऊपर के कक्ष में लेकर गए। उन्होंने हमें श्री यंत्र व अन्य मूर्तिया दिखलायी जो मंदिर में बड़े प्राचीन काल से रखी है।उन्होंने बताया कि राजराजेश्वरी माता, राजाओं की कुलदेवी है। और राजा इन्हीं की पूजा करते थे और इनसे ही युद्ध मे विजय और धन व अच्छा राजपाट प्राप्त करने के लिए वर मांगते थे।

मैंने फ़ोटो खींचना चाहा तो पुजारी जी ने मना कर दिया। हम कुछ देर मंदिर में बैठे रहे फिर नीचे उतर आए। यह मंदिर अन्य मंदिरों के तरह नहीं हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि हम मंदिर में है। ऐसा लगता है कि जैसे हम किसी पहाड़ी घर पर है। मतलब मंदिर की बनावट घर जैसी है। यहां आकर मुझे बड़ा अच्छा लगा ऐसा लगा कि कि मैं वाकई में किसी शक्ति के पास हूं । यहां का वातावरण बहुत स्वच्छ व शांतमय था। पुजारी जी भी बड़े सज्जन व सीधे सादे लगे। हमे बड़े आराम से शांति से दर्शन हुए। पुजारी जी का व्यवहार और इस मंदिर का इतिहास जानकर मन खुश हो गया।
तभी मेरा बेटा देवांग जमीन पर गिर गया चोट तो नही लगी पर मेरा छोटा कैमरा टूट गया। जिस कारण देवांग परेशान हो गया। क्योंकि वो कैमरा मैंने उसे ही दे दिया था। और वह अब पूरे ट्रिप पर फ़ोटो नही खींच पाएगा यह सोच कर वह ज्यादा उपसेट था। कुछ ही देर में वह और बच्चों की तरह सब भूल गया और सही भी हो गया। कुछ समय बाद हम नीचे उतर आये और कार में बैठ कर आगे धारा देवी की तरफ चल पड़े।
नीचे सड़क से मंदिर का रास्ता।
देवांग
गौरा देवी मंदिर प्रवेश द्वार
गौरादेवी मंदिर
मंदिर के अंदर
एक अन्य मंदिर
राजराजेश्वरी मंदिर को जाता रास्ता।
राजा का चबूतरा और कुंआ भी दिखता हुआ
राजराजेश्वरी मंदिर
धारा देवी मंदिर (धारी देवी)
हम देवलगढ़ से कल्यासोड़ मात्र आधे घंटे में ही पहुँच गए दूरी लगभग 14 km तय की गई। पिछली बार जब में बद्रीनाथ जी व चोपता गया था। इसी रास्ते से होते हुए गया था लेकिन तब भी धारा देवी के दर्शन नही किये थे। इसलिए अबकी बार दर्शन जरूर करूँगा यह पहले से ही तय कर चुका था। मैंने गाड़ी को नीचे नदी के किनारे ही लगा दिया। और पतले से लोहे के पुल से होते हुए मैन मंदिर में प्रवेश किया। ज्यादातर लोग जमीन पर बैठे हुए थे। और तीन चार पंडे- पुजारी बारी बारी से नीचे बैठे लोगों को बुला रहे थे और बड़े आराम से पूजा करवा रहे थे। हमारा भी नंबर आ ही गया और हमने भी माँ धारा देवी जी की पूजा बड़े आदर से की। इन देवी को उत्तराखंड की रक्षा करने वाली देवी माना गया है। यह हिमालय पुत्री पार्वती माता ही है। कुछ लोगो का मानना है। कि जब डैम बनने के कारण इनको इधर से हटाया गया तो यह गुस्सा हो उठी थी। जिस कारण केदारनाथ में प्रलय आ गयी थी। अब हम मंदिर से बाहर आ गए और अलकनंदा नदी के तट पर भी गए। कुछ देर बाद इधर बिताने के बाद हम आगे सफर पर चल पड़े।

आज हमें फाटा हेलीपैड के आस पास रुकना था क्योंकि हमें कल सुबहें 7 बजे फाटा से हेलिकॉप्टर द्वारा केदारनाथ पहुचना था। कल्यासोड़ से फाटा लगभग 80km की दूरी पर है और यह दूरी तय करने में हमे लगभग 3 से साढ़े तीन घंटे लग ही जायंगे। आगे हम रुद्रप्रयाग रुके इधर एक होटल पर खाना भी खाया और रुद्रप्रयाग से केदारनाथ वाले रास्ते जो की मंदाकनी नदी के साथ साथ चलता है मुड़ गए। रुद्रप्रयाग से एक रास्ता अलकनंदा नदी के साथ साथ बद्रीनाथ जी को चला जाता है। अगस्तमुनि, कुंड व गुप्तकाशी होते हुए हम शाम के लगभग 4 बजे फाटा पहुँच गए। हेलीपैड से कल की पूरी जानकारी ले ली और पास मेंं ही होटल देेेख लिया रुकने के लिए। यह एक नया होटल था फ़िलहाल होटल का नाम भूल गया हूँ, लकिन नंबर मेरे पास है। (9582970010 प्रमोद फाटा ). लकिन हम इसके पहले ग्राहक थे। होटल थोड़ा महंगा मिला 2000 प्रति दिन के हिसाब से क्योंकि चार धाम यात्रा शुरू हो चुकी है और इस दौरान होटल व अन्य सेवाएं महंगी मिलती है। । और हम रात को इधर ही रुक गए…..

रास्ते में कही किसी जगह से दिखता चोखम्बा पर्वत
फाटा
फाटा होटल
फाटा

यात्रा अभी जारी है. …..

ज्वाल्पा देवी से ख़िरशू

मेरी केदारनाथ यात्रा
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ख़िरसू, पौड़ी गढ़वाल
30 अप्रैल 2018, मंगलवार
जब हम ज्वाल्पा देवी से चले तब दोपहर के लगभग 3:30 बज रहे थे। वैसे तो हमें आज के दिन कलडूँग में गो हिमालय के होमस्टे पर रुकना था। लेकिन मेरे मित्र बीनू कुकरेती जी से जब मेरी बात हुई तो उन्होंने कहा जब इधर घूमने आ ही रहे हो तो फिर ख़िरसू घूम कर आना। उन्होंने बताया कि ख़िरसू एक बहुत सुंदर जगह है। और उधर से हिमालय के दर्शन भी बहुत बढ़िया से होते है। चौखम्भा पर्वत भी दिखता है। इसलिए हमने ख़िरसू में ही रुकने का प्लान कर लिया।

ज्वालपा देवी से ख़िरसू की दूरी लगभग 41 किलोमीटर है। जो हमने लगभग डेढ़ घंटे में पूरी कर ली थी। पूरा रास्ता पहाड़ी घुमावदार ही है। रास्ते मे कई गांव आते है उन्ही में एक स्थान आता है बुवाखाल। बुवाखाल से एक रास्ता बांए तरफ पौड़ी की तरफ चला जाता है। और फिर श्रीनगर के लिए। और एक रास्ता सीधा आगे ख़िरसू के लिए चला जाता है। इसी रास्ते पर आगे चोबट्टा आता है, बाद में ख़िरसू। हम ख़िरसू वाले रास्ते पर चल पड़े। कुछ समय बाद हमे सड़क के दोनों तरफ बड़े बड़े पेड दिखने शुरू हो गए। यह चोबट्टा था और यह बेहद सुंदर जगह थी। चोबट्टा से थोड़ा आगे ही ख़िरसू है शायद दो या तीन किलोमीटर। हमे ख़िरसू में प्रवेश करते ही काफी भीड़भाड़ दिखाई दी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई स्थानीय मेला चल रहा था। क्योंकि ज्यादातर लोग स्थानीय ही लग रहे थे, जब हम गढ़वाल मंडल के गेस्ट हाउस (gmvn) पहुंचे। तब हमें पूरी तरह पता चल चुका था कि यह एक वार्षिक मेला है जो अभी अभी समाप्त हुआ है। इसलिए भीड़ ज्यादा दिख रही है। GMVN के गेस्ट हाउस पहुंचते ही हमने एक रूम (hut) ले लिया। मैंने यह रूम इसलिए लिया क्योंकि इस रूम की खिड़की से पर्दा हटाते ही अंदर से ही हिमालय दर्शन हो रहे थे। इस रूम के एक रात के ठहरने का किराया मुझे 1650 रुपये चुकाना पड़ा। जबकि यहां रुकने के और भी सस्ते विकल्प थे। अगर मुझे ख़िरसू gmvn गेस्ट हाउस की तारीफ करनी हो तो मैं इन शब्दों में करूँगा की यह काफी शांत व मनमोहक जगह पर बना है। यह खुली जगह पर बना है। एक तरफ जंगल दिखता है, तो दूसरी तरफ हिमालय। कुछ दिन एकांत में व्यतीत करने हो तो मोबाइल को बंद करके इधर रहा जा सकता है।

खिर्सू

गेस्ट हाउस के सामने एक सूखा पेड़ था। उस पर कुछ लंगूर बैठे हुए थे। जो उछलकूद कर रहे थे। गेस्ट हाउस में ही तरह तरह के पौधे लगे हुए थे। जिनपर फल व फूल भी लगे हुए थे। जो हर किसी को अपनी और आकर्षित कर रहे थे। यहां से चौखम्बा पर्वत समेत अन्य कुछ पहाड़ियों के भी दर्शन हो रहे थे। गेस्ट हाउस में हमारे अलावा दो तीन फैमिली और रुकी हुई थी। एक परिवार जो दिल्ली से ही आया हुआ था। जब उनसे बात हुई तो उन्होंने बताया कि उन्हें आये इधर अभी दो दिन ही हुए है, वह हर साल इधर ही आते है। और तीन- चार दिन रहते है। उन्होंने इसका कारण यहाँ की हवा, पानी व वातावरण को बताया जो उन्हें इधर हर साल बुलाती है। एक परिवार से और मिला वह हमारे शाहदरा से ही थे और मेरे एक अंकल के जानकार भी निकले और साथ मे मेरे घुमक्कड़ मित्र व गो हिमालय होम स्टे के मालिक सूर्य प्रकाश डोभाल जी के मामा भी निकले। उन्होंने बताया कि वह ख़िरसू के ही है लेकिन कई सालों बाद यहां आए है। इन सभी लोगो से बात करके अच्छा लगा।

वैसे मेरी नज़र में ख़िरसू कोई हिल स्टेशन नही है, बल्कि एक गांव ही है। यह मसूरी और नैनीताल जैसा नही है। इसका यह कारण है कि जब उत्तराखंड, उत्तरप्रदेश से अलग हुआ तब ख़िरसू व ऐसे कुछ गांव पर्यटन मानचित्र पर उभर कर आये। उत्तराखंड सरकार ने कुछ ऐसी जगहों को प्रमोट किया। उन्ही जगहों में ख़िरसू भी है। अभी यहाँ gmvn के गेस्ट हाउस समेत एक दो होटल ही मात्र है, बाकी होमस्टे भी हो सकते है। घूमने के लिए एक मनोरंजन पार्क बना है। और घंडियाल देवता का मंदिर है, जो एक बड़े से मैदान के पास बना है। यह यहां के स्थानीय देवता है और पूजनीय भी। सालभर यहाँ मौसम ठंडा और अच्छा ही रहता है। गर्मियों में यहां बहुत भीड़ होती है। यह समुंदर की सतह से लगभग 1750 मीटर की ऊंचाई पर बसा है। इसके आस पास घने जंगल है। यहां चीड़, देवदार, बांज आदि के दरख़्त(पेड़) पाए जाते है। इसलिए यहाँ की हवा में स्वच्छता है। इधर कई तरह-तरह के पक्षियों को देखा जा सकता है। कुल मिलाकर यह एक सुंदर जगह है जहां पर आप शांति से कुछ पल बिता सकते हैं।
हम अपने रूम में पहुँचे ही थे कि जोर जोर से बारिश होने लगी। अब ठंडक पहले से बढ़ गयी थी। लेकिन बारिश थोड़ी देर बाद ही रुक गयी। जैसा अकसर पहाड़ो की बारिश होती था थोड़ा पड़ी और रुक गयी। फिर हमने गरमा गरम चाय पी और बाहर ख़िरसू घूमने के लिए निकल गए। हम एक बड़े से मैदान में पहुँचे। कुछ लोग अपनी दुकानें समटने में लगे थे। क्योंकि मेला आज थोड़ी देर पहले ही समाप्त हुआ था। सामने ही एक मंदिर दिख रहा था। वही घंडियाल देवता का मंदिर है, एक बच्चे ने मेरे पूछने पर बताया। मंदिर का बाहरी गेट खुला था। लेकिन अंदर वाला चेनल (गेट) बंद था। चलो कोई बात नही, हमने मंदिर देखना था और देवता को प्रणाम करना था। वो हमने कर ही लिए थे। अब मेरा बेटे देवांग को भूख लगने लगी थी इसलिए हम वापिस गेस्ट हाउस में लौट आये। क्योंकि ख़िरसू में खाने के लिए हमे कोई रेस्टोरेंट नही दिखा। गेस्ट हाउस पहुचे तो हल्का अंधेरा होने लगा था। सामने स्वेत हिम पर्वतों पर ढ़लते सूरज की लालिमा पड़ रही थी। तभी गेस्ट हाउस की लाइट चली गयी थोड़ी देर बाद एक कर्मचारी आये उन्होंने एक माचिस और एक मोमबत्ती (कैंडल) हमे देते हुए कहा कि जबतक जनरेटर नही चलता आप कैंडल जला लीजिएगा। उन्होंने खाने का भी आर्डर ले लिया था। वैसे आधे घंटे में जनरेटर भी चल गया और खाना भी आ गया। बारिश फिर से चालू हो गयी थी। और थोड़ी देर में बंद भी। क्योंकि पहाड़ों पर बारिश ऐसी ही होती है। खाना खाने के बाद मैं टहलने के लिए बाहर आया लेकिन सर्द हवाओं की वजह से वापिस कमरे में जाकर रजाई में घुस गया।
घंडियाल देवता मंदिर
मैं सचिन मंदिर पर (घंडियाल देवता के )
अगले दिन
01 मई 2018, बुधवार
सुबह उठ गया समय देखा तो 5:15 बज रहे थे। जल्द ही बिस्तर से निकला और कैमरा उठा कर बाहर आ गया। बाहर ठंडी हवा चल रही थी। हल्का अंधेरा था। चांद गोल और बहुत नज़दीक दिख रहा था। दो तीन चिड़ियो की आवाज तो आ रही थी पर वह दिख नही रही थी। चाय पीना का मन हुआ लेकिन 6:30 से पहले वो भी नही मिलेगी। थोड़ी देर घूमने के बाद वापिस रूम में लौट आया और खिड़की के पास ही बैठ गया। लगभग आधा घंटे बाद फिर बाहर आया। अभी दूर बर्फ के पहाड़ काले दिख रहे थे। लेकिन जब सूर्य अपनी रोशनी से इन्हें जगमग करेगा तो पल पल में बहुत से रंग दिखेंगे। आसमान में बादल थे इसलिए हो सकता है कि वो फ़ोटो ना ले पाऊ जो मुझे लेने थे। अब गेस्ट हाउस में बाहर थोड़ी हलचल बढ़ी और एक कपल जो कि कोलकाता से आये थे। उनसे बात हुई उन्होंने बताया कि वो आज चोपता तुंगनाथ जायंगे। वैसे मैंने देखा वेस्ट बंगाल के लोग काफी घूमते है। अब उजाला हो चुका था। और थोड़ा कोहरा भी था। दूर चौखम्बा पर्वत व अन्य पर्वतों पर बदल छाए हुए थे। वो साफ नही दिख रहे थे। चाय रूम में पहुँच चुकी थी इसलिए मैं भी रूम की तरफ बढ़ चला। और बाद में हम लोग गेस्ट हाउस से नाश्ता करने के बाद सुबह के लगभग 9 बजे आगे के सफर पर निकल गए…….
बर्फ के पर्वत अभी श्याम रूप लिए हुए है।
अब थोड़ा प्रकाश आया सूर्य का।
आड़ू
यात्रा अभी जारी है. …..

दिल्ली से ज्वाल्पा देवी मंदिर

मेरी केदारनाथ यात्रा
ज्वाल्पा देवी मंदिर, पौड़ी गढ़वाल

ज्वाल्पा देवी मंदिर , पौड़ी गढ़वाल
केदारनाथ नाम सुनते ही मन मस्तिष्क में हिमालय की हिमाच्छादित पर्वतीय चोटियों के बीच एक मंदिर की तस्वीर दिखलाई पड़ती है। केदारनाथ धाम के बारे में यह कहा जाता है कि जो व्यक्ति केदारनाथ जाता है उसपर तो शिव की कृपा होती ही है बल्कि जो व्यक्ति केदारनाथ धाम जाने की सोचता भी वह भी शिव की कृपा पाता है। इसलिये मेरा भी बहुत सालों से मन था केदारनाथ बाबा के दर्शन कर आऊं लेकिन हर बार प्रोग्राम किसी ना किसी कारण रदद हो ही जाता था। पिछले वर्ष 2017 में मैने तृतीय केदार तुंगनाथ महादेव की यात्रा की थी। वापिसी में केदारनाथ धाम जाने की सोची लेकिन उस यात्रा के सहयात्री ललित को एक अर्जेंट काम आ पड़ा और हम कुंड नाम की जगह से ही वापिस लौट आये थे। इस वर्ष 2018 में भी कुछ घुमक्कड़ (घुमक्कड़ी दिल से) दोस्तो का केदारनाथ यात्रा पर जाने का प्रोग्राम बना। अपना मन भी जाने को मचल पड़ा लेकिन उससे पहले ही मेरा छोटा सा एक्सीडेंट हो गया और मेरे बांये पैर की सबसे छोटी अंगुली मे क्रेक आ गया और चालीस दिन के लिए पैर पर प्लास्टर बंध गया। फिर भी मैं, दोस्तो के बनाये एक वाट्सएप्प ग्रुप केदारनाथ यात्रा से जुड़ा रहा और ग्रुप में बातों को पढ़ता रहा और जानकारी भी लेता रहा। और जैसे जैसे समय बितता गया केदारनाथ जाने की लालसा और प्रबल होती गयी। लेकिन अभी भी मेरे पैर में दर्द था। सभी दोस्त 27 अप्रैल को तय यात्रा पर निकल गए। इसी बीच मेरे मन में ख्याल आया कि क्यों ना यह यात्रा हेलीकॉप्टर द्वारा की जाए। जिससे मुझे चलना भी नही पड़ेगा। बाकी गाड़ी चलाने में मुझे कोई दिक्कत नही आने वाली थी। क्योंकि मेरी कार ऑटोमैटिक है, उसमें बांये पैर को पूरा आराम मिलता है। मैंने हेलीकॉप्टर के टिकेट के लिए गूगल पर बहुत सर्च किया और पाया कि अभी हेलीकॉप्टर बुकिंग खुली नही है। इसलिए एक एजेंट को बोल दिया कि 2 मई के टिकेट हो तो तीन टिकट बुक कर देना और अगर इस तारीख की नही मिले तो फिर रहने देना। 28 अप्रैल की रात को तकरीबन 8 बजे मैं अपने ऑफिस में बैठा था। तभी उस एजेन्ट का फ़ोन आया कि पवन हंस जो कि सरकारी हेलीकॉप्टर कंपनी है। उसकी साइट अभी अभी खुली है और 2 मई की फाटा से केदारनाथ की आने-जाने टिकट Rs6700 में मिल रही है। मैंने उसको तुरंत ऑनलाइन पेमेंट कर दी और कुछ ही देर बाद उसका फ़ोन आया कि आपकी टिकट कंफर्म हो गयी है और उसने टिकट मुझे मेरी मेल पर भेज दी है। अब मैने घर पर फ़ोन कर के यह सारी बात बता दी कि हमे 30 अप्रैल को सुबह केदारनाथ यात्रा पर निकल पड़ना है और कल तक सभी सामान पैक कर लेना है। मैंने चारधाम यात्रा का ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन पहले ही कर लिया था। जिसकी 50 रुपए प्रति व्यक्ति फीस भी लगी थी।
30 अप्रैल 2018 सोमवार
इस यात्रा में मेरे अलावा मेरी श्रीमती व मेरा बेटा थे। सुबह हमने 6 बजे दिल्ली स्तिथ घर से यात्रा शुरू कर दी। जल्द ही हम गाजियाबाद हिंडन के पुल को पार कर राजनगर एक्सटेंशन से होते हुए मुरादनगर गंग नहर पहुंचे। अभी फिलहाल हमें मुरादनगर में जाम नहीं मिला मुरादनगर में अक्सर जाम मिल जाता है। मैंने कल ही अपने मामा के लड़के से मुरादनगर गंगनहर वाला रास्ते का पता लगा लिया था और यह जान लिया कि यह रास्ता फिलहाल खतौली तक बेहतरीन बना है। यह रास्ता आगे सीधा मंगलौर तक चला जाता है लेकिन अभी वो ठीक नही है। हम गंगनहर के किनारे वाले वाले रोड पर सीधे चलते रहे। अब यह रोड काफी चौड़ा हो चुका है और आराम से गाड़ी सरपट दौड़ती चलती है। जल्द ही जल्द ही हम खतौली पहुंच गए। खतौली से मैं जानसठ- मीरापुर- कोटद्वार वाला रोड पर चल दिया। यह एक सिंगल रोड है। लेकिन ज्यादा ट्रैफिक नहीं है इस रोड पर हम आराम से इस पर चलते हुए लगभग 10:30 बजे के करीब हम कोटद्वार पहुंचे। कोटद्वार मैं पहले भी आया हूं, यहां पर हनुमान जी का एक मंदिर है जिसको सिद्धबली मंदिर कहा जाता है। लेकिन अब की बार जो की मैं परिवार के साथ आया था और हम सभी हनुमान जी के दर्शन करना चाहते थे। इसलिए मैंने गाड़ी को पार्किंग में खड़ी की और सिद्धबली मंदिर की तरफ चल पड़े। सिद्धबली मंदिर खोह नदी के किनारे एक टीले पर बना है। जब पिछली बार मैं यहां पर आया था। तो कपाट बंद हो रहे थे और बड़ी मुश्किल से मुझे बाबा के दर्शन हो पाए लेकिन आज जब मैं पहुंचा तो मंदिर के कपाट खुले हुए थे और सभी भक्त हनुमान जी के दर्शन कर रहे थे। हमने भी दर्शनों का लाभ लिया और कुछ वक्त मंदिर में बिता कर वापिस नीचे पार्किंग की तरफ चल पड़े। फिर हम गाड़ी में बैठकर आगे के सफर के लिए निकल पड़े।
मंदिर के लिए कुछ सीढ़िया चढ़नी पड़ती है।
मुख्य मंदिर व हनुमान जी ( सिद्धबली बाबा )
यहां से आगे हम दुगड्डा नाम जी जगह पहुँचे। यहाँ से एक रास्ता नीलकंठ महादेव के लिए भी चला जाता है। दुग्गड़ा से आगे चलकर एक मोड़ आता है। यहाँ से दो रास्ते अलग हो जाते है। एक रास्ता लैंसडौन के लिए चला जाता है जो कि 22 किलोमीटर दूरी पर है। और दूसरा रास्ता गुमखाल के लिए जो कि 14 किलोमीटर दूरी पर है। वैसे लैंसडाउन वाला रास्ता भी वापिस गुमखाल में ही मिल जाता है। लेकिन यह तक़रीबन 18 km ज्यादा पड़ता है। इसलिए हम गुमखाल की तरफ जाते रास्ते पर मुड़ गए। इसको मेरठ- पौड़ी रोड भी कहते हैं। क्योंकि यह सीधा रास्ता पौड़ी की तरफ चला जाता है और हमें भी पौड़ी के रास्ते से ही जाना था। थोड़ी दूर चलने के बाद लंबे लंबे चीड़ के वृक्ष सड़क के दोनों तरफ दिखाई दे रहे थे। ऐसा लग रहा था, जैसे एक जन्नत में आ गए हो। चारों तरफ हरियाली फैली थी और रास्ते पर एक या दो गाड़ी ही दिख रही थी। वातावरण में शुद्ध हवा थी। आँखों को यह सब अच्छा लग रहा था। ज्यादातर ऐसे मेरे साथ होता है जब भी मैं ऐसे स्थान को देखता हूँ तो मैं गाड़ी थोड़ी देर रोक ही लेता हूँ। इसलिए आज भी रुक गए, कुछ समय हमने यहां बिताया और हम आगे की तरफ निकल गए। गुमखाल से थोड़ा सा ही आगे चलने पर एक तिराहा आता है। यहां से एक रास्ता बांये तरफ जाते हुए द्वारीखाल पहुंचता है और फिर यह रास्ता आगे नीलकंठ होते हुए ऋषिकेश निकल जाता है। इसी रोड पर मेरे दोस्त बीनू का गांव बरसूडी भी है। बहुत सुंदर गांव है आने वाले सितम्बर को इस गांव में आना होगा हम कुछ दोस्तों का। दूसरा रास्ता पौड़ी की तरफ चला जाता है इसी रास्ते पर सतपुली नामक जगह पड़ती है जहाँ से एक रास्ता देवप्रयाग चला जाता है। और एक पौड़ी के लिए, हम उसी पौड़ी रोड पर ही आगे चल रहे थे। सतपुली से तकरीबन 20 किलोमीटर चलने पर उत्तरी नयार नदी के किनारे ज्वाल्पा देवी का प्राचीन मंदिर है। हमने गाड़ी के ब्रेक मंदिर के बाहर ही लगाए और सीधा मंदिर की तरफ चल पड़े। मंदिर सड़क से कुछ दूरी पर नीचे नदी के किनारे पर बना हुआ है। इस मंदिर से जुड़ी एक कथा है।
कथा के अनुसार यहां पर पुलोमा नामक असुर की पुत्री शची, देवताओ के राजा इंद्र को पति के रूप में पाना चाहती थी। इसलिए शची ने इस जगह पर माँ पार्वती की आराधना की थी। तब पार्वती जी ने यहां पर ज्वाला रूप में शची को दर्शन दिए और उनको मन वांछित वर भी दिया। जिसके कारण उसने इंद्र को अपने पति के रूप में पाया। मां पार्वती ने यहां पर ज्वाला के रूप में शची को दर्शन दिए थे इसलिए आज भी माँ पार्वती एक अखंड ज्योति रूप में इस मंदिर में विराजमान है। और हर भक्त की मनोकामना पूर्ण करती है।

ये रास्ते
ये रास्ते
ज्वाल्पा देवी मंदिर द्वार सड़क से
हम थोड़ी देर बाद मंदिर में पहुँच गए। मंदिर नयार नदी के किनारे ही स्तिथ है। रुकने के लिए एक धर्मशाला भी बनी थी। हमने माता के दर्शन किये। पुजारी जी ने एक कथा और बतायी इस मंदिर से जुड़ी। उस कथा के अनुसार इस जगह कुछ व्यापारी रात को रुके। वह नीचे शहर से कुछ सामान लाये थे। अगली सुबह जब सभी व्यापारी चल पड़े तो एक व्यापारी की गठरी उठ नही पायी जब गठरी खोली गई तो उसमें माता की मूर्ति निकली। वही मूर्ति आज मंदिर में है।
हम दर्शन करने के पश्चात नयार नदी के किनारे पहुँचे। फिर हम नदी के किनारे एक बड़े से पत्थर पर बैठ गए। नदी की कल कल बहती धारा बहुत सुंदर लग रही थी। और जल के प्रवाह की आवाज भी कानो में पड़ रही थी। आस पास कुछ लोग और भी थे। जो अपनी सेल्फी लेने में मस्त थे। पास में ही एक लोहे का पुल बना था। जो शायद नयार के पार किसी गांव के लिए बनाया गया होगा। बीच बीच मे मंदिर की घंटियों की बजने की आवाज़ आ जाती थी। कुछ समय यहाँ बिताने के बाद हम ऊपर सड़क पर पहुँच गए और आगे के सफर पर निकल पड़े।
ज्वाल्पा देवी मंदिर
यात्रा अभी जारी है. …..

रेणुका जी हिमाचल प्रदेश की एक खूबसूरत झील

गर्मियांगर्मियां आ चुकी है। हर कोई बाहर पहाड़ों की तरफ घुमने के लिए निकल पडा है या फिर घुमने का कार्यक्रम बना रहा है। आज कल सभी लोग छुट्टी होते ही, शीतलता पाने के लिए पहाड़ों की तरफ चल पडते है जिस कारण मसूरी, शिमला व नैनीताल जैसे पहाडी शहरो में पर्यटकों की भीड के कारण जाम की स्थिति बन जाती है। ऐसे में हर कोई चाहता है की ऐसी जगह जाया जाए। जहां प्रकृति की सुंदरता के साथ साथ शीतलता भी हो और भीड भाड भी ना हो। तो आज मैं आपको एक ऐसी जगह लेकर चलता हूं। जो सुंदर है, पौराणिक महत्व लिए है, वहां एक सुंदर झील भी है, जहां आप बोटिंग भी कर सकते है और साथ में बच्चो के लिए एक छोटा सा चिड़ियाघर भी है और यह दिल्ली के बेहद नज़दीक भी है। आप सोच रहे होंगे की ऐसी कौन सी जगह है? तो चलो मैं आपको इस जगह के बारे में बता ही देता हूं। यह जगह हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में और शिवालिक पहाडियों के बीच बसी है। इस जगह का नाम रेणुका जी है। दिल्ली से तकरीबन 295 किलोमीटर तथा छ: से सात घंटे की दूरी मात्र पर स्थित है यह रेणुका जी। यह अपनी सुंदर झील के लिए प्रसिद्ध है जिसे अगर ऊपर आसमान से देखा जाए तो यह झील एक स्त्री का रूप लिए दिखती है और इस जगह को भगवान परशुराम जी की जन्मस्थली भी माना जाता है। आपको इस जगह के बारे में जानकर अच्छा लगा ना। जब आप यहां आएगे तब आपको और भी अच्छा लगेगा।

क्या क्या देखें…
यहां पर बहुत सुंदर व पवित्र झील है। जिसकी लोग परिक्रमा भी करते है। यह परिक्रमा मार्ग लगभग तीन किलोमीटर लम्बा है। जिस पर चलना बहुत ही रोमांचित करने वाला होता है । एक तरफ झील का सौंदर्य आपको मोहित कर रहा होता है तो दूसरी तरफ बने चिडियाघर में जानवरो को देखना बेहद अच्छा लगता है। भालू, शेर, तेंदुए और हिरण जैसे जानवर भी यहां पर आप देख सकते है। इन सभी जानवरो को अलग अलग व खुले पिंजरों में रखा गया है। जिन्हे देखकर बच्चे तो बच्चे बड़े भी बहुत आन्नद लेते है। और इन्ही के कारण झील की परिक्रमा कब पूरी हो जाती है हमे एहसास ही नही होता। यह कुछ जंगल सफारी जैसा महसूस कराता है। झील की परिक्रमा आप अपनी कार व दोपहिया वाहन से भी कर सकते है लेकिन सोमवार को यह सुविधा नही होती। सोमवार के दिन सिर्फ पैदल ही परिक्रमा होती है। झील में मौजूद कई तरह की मछलियां व कछुआ देखने को मिलते है। कुछ लोग आटे की बनी गोलियों इनको खिलाते है। इन्हे देखना भी बडा मनमोहक होता है। झील के किनारे पर बने कुछ मन्दिर व आश्रम भी दर्शनीय है। झील के निकट भगवान परशुराम राम मन्दिर व उनकी तपस्थली भी देख सकते है। परशुराम की माता रेणुका जी, जिनके नाम से यह झील है, उन का मन्दिर भी नजदीक है। यहां पर बहुत तरह के पक्षियों को भी देख सकते है और इनकी सुरीली चहचहाहट हर जगह सुनने को मिलती रहती है।

कहां ठहरे…
यहां पर ठहरने के लिए हिमाचल प्रदेश का गेस्ट हाऊस भी बना है। जो झील के बेहद नजदीक है। साथ मे आप झील के नजदीक बने आश्रमों में भी ठहर सकते है। आप रेणुका झील से तकरीबन दो किमी पहले गिरी नदी के किनारे पर बसे एक कस्बे ददाहू में भी ठहर सकते है। यहां पर कई होटल बने है।

कैसे पहुंचे…..
रेणुका जी सड़क मार्ग से कई बडे शहरो से जुडा है। दिल्ली से पानीपत व कुरूक्षेत्र होते हुए कालाअम्ब पहुँचा जाता है, जहां से नाहन और रेणुका पहुंच सकते है। दिल्ली से रेणुका झील तक सड़क मार्ग की दूरी मात्र 295 किलोमीटर है। अम्बाला शहर से रेणुका जी मात्र 115 किलोमीटर की दूरी मात्र पर स्थित है। देहरादून से रेणुका जी बेहद नजदीक है यहां से रेणुका झील मात्र 95 किलोमीटर की दूरी पर ही है। रेणुका जी के नजदीक ददाहू कस्बे से देहरादून व शिमला और अन्य जगहों के लिए बस सर्विस भी उपलब्ध है।

रेणुका झील का पौराणिक महत्व….
रेणुका झील के निकट भगवान परशुराम की जन्मस्थली भी है। रेणुका जी परशुराम जी की माता थी। इस झील का नाम रेणुका झील क्यों पडा इसके पीछे एक पौराणिक कहानी है…….
कभी पहले यह घनघोर जंगल हुआ करता था। यहा पर ऋषि जमदग्नि और उनकी पत्नी भगवती रेणुका जी का आश्रम था। उनके पुत्र राम (जो बाद मे शिव जी के फरसे के कारण परशुराम कहलाए) रहते थे। बालक राम अपनी तपस्या के लिए कही गए हुए थे। उसी दौरान जंगल में शिकार खेलने के लिए राजा सह्त्रबाहु आया, वह बहुत भूखा-प्यासा था। इसलिए वह जमदग्नि के आश्रम को देखकर, वहां पहुंचा। वहां रेणुका जी ने उन्हे बहुत स्वादिष्ट कई तरह के व्यंजन खाने के लिए दिए। राजा भोजन करने के बाद बहुत खुश हुआ, उन्होने रेणुका जी से पुछा की आप इस घने जंगल में इतने स्वादिष्ट भोजन कहां से लेकर आई? तब रेणुका जी ने उन्हे अपनी कामधेनु गाय के विषय में बताया। कामधेनु से जिस चीज की आप इक्छा करेगे यह गाय उन सभी इक्षाओ को पूरा करती है। तब राजा सहत्रबाहु ने अपने बल के जोर पर वह गाय अपने अधिकार में ले ली और ऋषि जमदग्नि की हत्या कर दी। और बल पूर्वक माता रेणुका को भी ले जाने लगा तब रेणुका जी ने अपनी लाज बचाने के लिए, वहां पर बने एक सरोवर मे जल समाधि ले ली। उधर परशुराम बडे हुए और शिव से शस्त्र शिक्षा ग्रहण कर अपने घर पहुचें तब उन्हे राजा सहस्त्रबाहु के इस अपराध के बारे में पता चला। उन्होनो राजा सहस्त्रबाहु व उसकी सम्पूर्ण सेना का विनाश अपने फरसे से कर दिया तब से ही वह राम से भगवान परशुराम कहलाए। उन्होने अपने तपोबल से अपने पिता ऋषि जमदग्नि को जिन्दा कर दिया और अपनी मां को भी सरोवर से बाहर आने पर मजबूर कर दिया । तब माता रेणुका जी ने परशुराम जी को वचन दिया की वह हर वर्ष देव प्रवोधिनी एकादशी को इस सरोवर से बाहर आया करेगी और सभी भक्तों को दर्शन व आशीर्वाद देती रहेगी। इतना कहकर मां रेणुका जी सरोवर के जल मे विलिन हो गई। तब से यह सरोवर रेणुका झील कहलाने लगा।

भानगढ़ किले की यात्रा

21 जनवरी 2018

भानगढ़ का इतिहास :
भानगढ़ क़िले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 16 वी शताब्दी (1573 )में बनवाया था। बाद में भगवंत दास के पुत्र व राजा मान सिंह के छोटे भाई माधो सिंह ने इसे अपनी रियासत की राजधानी बना लिया। माधो सिंह मुग़ल शहंशाह अकबर के राज में उनके दीवान थे। माधो सिंह के बाद उसका पुत्र छत्र सिंह गद्दी पर बैठा। कुछ समय पश्चात हरिसिंह का शासन भानगढ़ पर रहा । यही से भानगढ़ का पतन शुरू हुआ। छत्र सिंह के बेटे अजब सिह ने भानगढ़ के नजदीक ही अजबगढ़ का किला बनवाया और वहीं रहने लगा। इस समय औरंगजेब का क्रूर शासन पूरे भारत में फैला हुआ था। औरंगजेब कट्टर पंथी मुसलमान था। उसके दबाव में आकर हरिसिंह के दो बेटे मुसलमान बन गए, बाद में जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह ने इन दोनो को मारकर भानगढ़ पर कब्जा कर लिया तथा माधो सिंह के वंशजों को भानगढ़ का राज्य सौंप दिया।

( यह जानकारी भानगढ़ में लगे एक पुरातत्व विभाग के बोर्ड़ व विकिपीडिया द्वारा प्राप्त जानकारी के आधार पर है।)
यात्रा वृतांत
कुछ दिन जयपुर में परिवार संग घुमक्कड़ी कर वापिस घर की तरफ लौट रहा था। मुझे भानगढ़ क़िले को देखने की बहुत दिन से इक्छा थी, भानगढ़ अलवर ज़िला में स्तिथ है। यह सरिस्का वन अभ्यारण के नजदीक है। इस क़िले को भूतिया क़िला कहा जाता है। इसलिए हम जयपुर से भानगढ़ की तरफ चल दिए। जयपुर से भानगढ़ की सड़क से दूरी तक़रीबन 70 किलोमीटर है जिसको तय करने में डेढ़ से दो घंटे लग जाते है। दोपहर के साढ़े बारह का समय हो रहा था जब हम जयपुर से चले। हमने जयपुर आगरा रोड पकड़ लिया। यह रोड बहुत बढ़िया बना है। जयपुर से निकलते ही पहाड़ो के बीच से निकली एक लम्बी सुरंग मिली यह कुछ-कुछ मनाली के रास्ते में ओट जगह के नजदीक वाली सुरंग जैसी थी। वैसे इन सुरंगो को बनाने में बहुत मेहनत करनी होती है। लेकिन सड़़क यातायात केे मार्ग सुगम बन जाते है। सुरंग से पहले एक टोल पर ऐसा वाक्या हुआ जिस पर मुझे अपने आप पर बहुत शर्म आयी। हुआ यूँ की में एक टोल पर लाईन में लगा था तभी एक व्यक्ति बोला की आप उधर लाइन में मत लगो इधर वाली लाईन में लगो। तब मैंने उससे कहा की मैं इधर ही लगाऊगा अपनी गाड़ी । फिर उसने बोला की यह टोल प्राइवेट गाड़ी के लिए फ्री है और आप टोल देय वाली लाईन में लगे है। तब मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ और उस व्यक्ति को धन्यवाद बोलकर टोल बैरियर सेे बाहर गया और आगे बढ़ चला। गूगल मैप पर देखा तो भानगढ़ अभी भी तकरीबन 60 km की दूरी पर था। हमे दौसा तक इसी सड़क पर आगे बढना था फिर दौसा से एक सड़क बांंयी तरफ भानगढ़ के लिए चली जाती है, और सीधी सड़क भरतपुर की तरफ चली जाती है।
सुबहे होटल में ही नाश्ता किया था अब भूख जोरो से लग रही थी। इसलिए सड़क के किनारे पर बने एक ढ़ाबे पर पेट पूजा की गयी। खाना खाने के बाद हम आगे की और चल पड़े। जल्द ही दौसा पहुंच गए, दौसा में काफी होटल है जहा रुका जा सकता है और आसपास के दर्शनीय स्थलों को देखा जा सकता है। हम बांये रास्ते को मुड़ गए यहाँ से भानगढ़ तक़रीबन 32 km है। मतलब 40 मिनटों में हम वहां पहुंच ही जायँगे। अब रोड छोटा हो चला था कही कही सड़क निर्माण कार्य चल भी रहा था। कुल मिला कर रोड ठीक ठाक था। अब हमे ग्रामीण परिवेश में होने का अहसास हो रहा था। सड़क के दोनों तरफ गाँव दिख रहे थे। कही कही कुछ लोग राजस्थानी पहनावा पहने भी दिख रहे थे। हम शाम के लगभग चार बजे भानगढ़ पहुंचे। क़िले से कुछ दूरी पर 50 रुपयों की एक पर्ची काटी गयी। बाकि क़िले देखने का कोई टिकट नहीं था।
गाड़ी एक तरफ खड़ी कर हम क़िले में प्रवेश कर गए। प्रवेश द्वार के ही समीप हनुमान मंदिर बना है। यहाँ से आगे चलते ही पुराना बाजार आ जाता है रास्ते के दोनों तरफ दुकाने बनी है, जो कभी दो मंज़िला रही होगी। जिनको देखकर लगता है की कभी यहाँ पर बहुत बड़ा बाजार रहा होगा। आज मात्र उनके खंडर अवशेष ही बचे है। इस बड़े बाजार से होते हुए हम एक और दरवाजे पर पहुंचे। यह महल का दरवाजा है। दरवाजे के बायें तरफ एक खंडरनुमा इमारत है, और दाहिनी तरफ गोपीनाथ मंदिर है। गोपीनाथ मंदिर कभी विष्णु भगवान को समर्पित होगा लकिन फ़िलहाल यह मंदिर मूर्ति रहित है। मंदिर की बुर्ज भी नहीं है। लकिन यह मंदिर बाहर से उत्तम वास्तुकला का एक सुन्दर उदाहरण है। जब कभी यह महल आबाद रहा होगा तब यह कितना सुन्दर रहा होगा। केवल आज हम सोच ही सकते है। यह क़िला तीन तरफ से अरावली की पहाड़ियों से घिरा है। जो इसे और भी खूबसूरत बनाता होगा, लकिन आज यह एक भूतिया क़िला मात्र बन कर रह गया है। थोड़ा आगे चलने पर एक पानी की बाबड़ी है, जिसमे आज भी भरपूर पानी था। बाबड़ी के नजदीक ही सोमेश्वर महादेव मंदिर है। जो शिव को समर्पित है, यही पर हमे एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया की अब पर्यटक इधर आने लगे है पहले केवल आसपास के लोग ही आते थे। उसने हमे यह भी बताया की यहाँ कोई भूत -प्रेत नहीं है। यहाँ केवल जंगली जानवर है जिसमे जंगली सूूअर व तेंदुआ है जो गर्मीयो में यहाँ बाबडी पानी पीने भी आते है। उसने बताया की वह यहाँ कई साल से आता है लकिन उसे आज तक यहां कोई भी ऐसी अजीब बात महसूस नहीं की जिससेे यह साबित हो की यहां पर भूत प्रेत रहते है। उसने तांत्रिक सिंघिया की कहानी को भी नकली बताया। उसने एक पहाड़ी की तरफ इशारा करतेे हुुुए, एक छतरी दिखाई उस ने बताया की लोग उसे तांत्रिक की छतरी कहते है , और तरह तरह की कहानियों से जोड़ते है। जबकी वह पहले सैनिको के लिए रही होगी जहां सेे वह दूूूर तक नजर रख सके। उसको धन्यवाद करने के बाद हम मंदिर से बाहर आ गए

श्रीमती जी
मैं ही हूँ सचिन त्यागी

मंदिर से थोड़ा आगे चलकर एक और दरवाजा आया जो मुख्य महल या कहें की शाही राजमहल का था। कहते है की कभी यह कई मंजिला था लकिन आज दो या तीन मंजिल का ही रह गया है वो भी जर्जर हालत में। वैसे इस क़िले को भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपने अधिग्रहण कर लिया है। हम किले की पहली मंजिल पर पहुुुुँचे, यहां पर आकर मेेेेरी श्रीमती और बेटा ऊपर नहीं गये क्योकि वो चलते चलते बहुत थक चुके थे। मैं ही ऊपर किले की तरफ चला गया। पहली मंजिल पर एक गलियारा बना था जिस के अंदर कमरे बने थे। जो अंधेरा समेटे हुए थे। यहां मेरे अलावा ओर कोई नही दिख रहा था। इसको देखकर मैंने अनुमान लगाया की यह जेल भी हो सकती है या फिर सैनिको की विश्राम करने की जगह भी। यहाँ से ऊपर चलने पर छत आ जाती है। इसकेे ऊपर जो मंजिले थी वह आज पूरी तरह से नष्ट हो चुकी है। कभी यह बहुत सुंदर बना हुआ होगा, हर जगह चहल पहल रहती होगी।

इस किले की बर्बादी की भी बहुत सी कहानी है। इतिहास में वर्णित है की अज़बगढ़ और भानगढ़ में युद्ध हुआ जिसमे भानगढ़ हार गया और सब मारे गए और यह किला भी तबहा हो गया। लकिन कुछ लोगो का मानना है, की भानगढ़ तबाही के पीछे एक तांत्रिक सिंघिया का श्राप है। कहते है की भानगढ़ में एक तांत्रिक रहा करता था। जो काले जादू करने में माहिर था। उसने भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती को देखा और उस पर मोहित हो गया। वह उसको हर कीमत पर पाना चाहता था। उसने काला जादू कर एक इत्र की शीशी को राजकुमारी तक पंहुचा दिया अगर राजकुमारी उस इत्र को लगा लेती तो वह भी उसकी तरफ मोहित हो जाती लकिन रत्नावती को उस तांत्रिक की इस चाल का पता चल गया और राजकुमारी ने वह इत्र की शीशी एक पत्थर पर फैक कर तोड दी। जिससे यह हुआ की वह पत्थर तांत्रिक के काले जादू के कारण तांत्रिक पर मोहित हो गया और उसी पत्थर के कारण तांत्रिक की मौत हो गई। लेकिन तांत्रिक सिंघिया ने मरते मरते भानगढ़ को यह श्राप दिया की भानगढ़ पूरी तरह से तबाह हो जाएगा और सभी लोग मारे जाएगे। कहते है की बाद में अजबगढ़ ने भानगढ़ पर हमला किया जिस युद्ध में सब मारे गए और उनकी आत्मा व तांत्रिक सिंघिया की आत्मा आज भी भानगढ़ में मौजूद है। इसलिए ही इस किले को भूतिया किला माना गया है

मैं ऊपर से नीचे आ गया। अब समय भी लगभग शाम के पांच बज रहे थे। रास्ते में मुझे एक स्थानीय लडका मिला वह पास के गांव में ही रहता था। उसने बताया की वह कई बार इधर आया है। लेकिन उसे आज तक कोई भूत प्रेत नही दिखाई दिया है जबकी रात में जंगली जानवर जरूर उसके गांव तक आ जाते है। उससे बात कर हम बाहर की तरफ चल पडे। एक दो मन्दिर और बने है किले में लेकिन वह थोडा हट कर बने है इसलिए उधर ना जा सका। सीधा बाहर के गेट पर पहुंच गया, यहां गेट के साथ ही हनुमानजी का मन्दिर बना है वही पर एक बूढे बाबा बैठे थे। जो उस मन्दिर के पुजारी भी थे। उनसे कुछ लोग बात कर रहे थे । उनसे पूछ रहे थे की इस जगह को लोग भूतीया किला क्यो कहते है? और आपने कभी कुछ महसूस किया? उन बाबा ने कहा की मुझे यहां पर कई बार कुछ अजीब महसूस हुआ है, रात में जब मन्दिर में पूजा करने के बाद जब जाता हूं तब भी लगता है की कोई है आसपास। उन्होने बताया की वह भी रात में मुख्य किले में नही जाते।

उनकी बात सुनकर मैं किले से बाहर निकल आया। और अपनी कार में बैठ, दिल्ली के लिए निकल पडा। रास्ते में कई सवाल मन में आ रहे थे की दो व्यक्तियों ने यहां पर भूत प्रेत की घटना को केवल कहानी मात्र बताया जबकी तीसरे व्यक्ति ने यहां पर कुछ अजीब होना स्वीकार किया। चलो जो भी हो मुझे यह किला देखना था और मैने देख लिया था।

एक वीडियो भी बनाया है , जिसमे आप भानगढ़ क़िले का भृमणर सकते है।
वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करे।

ओरछा ,orchha (मध्यप्रदेश) 

मुकेश पांडेय जी द्वारा

ओरछा का राजमहल रात मे
बेतवा नदी व बुंदेली राजाओ की छतरीयां

आज में आप के सामने उस जगह का वर्णन कर रहा हूं, जहां पर जाने की मुझे बहुत ज्यादा जिज्ञासा थी। आज से तकरीबन चार साल पहले जब मैं ग्वालियर घूमने के लिए गया था। तब मुझे ओरछा के बारे में पहली बार पता चला। वहां पर मैने ओरछा की कई तस्वीरें देखी, जिनको देखकर में लगभग मोहित हो गया था। इन तस्वीरों में से एक तस्वीर में बेतवा नदी में रीवर राफ्टिंग करती बोट व पीछे बुंदेली छतरीयो को दर्शाया गया था। तभी से मेरे मन मे ओरछा की एक तस्वीर बन गयी और मैंने उसी दिन यह तय कर लिया कि एक बार ओरछा जरूरः जाना है। फिर मैं एक वाट्सएेप ग्रुप घुमक्कड़ी दिल से जुड़ा। उसी ग्रुप में कुछ दिन बाद ओरछा के रहने वाले श्री मुकेश पांडेय जी (अाबकारी निरीक्षक) जुड़े। उनसे दो तीन दफा अोरछा के बारे में बात भी हुई। फिर कुछ दिन बाद घुमक्कड़ी दिल से ग्रुप का एक महा मिलन कार्यक्रम ओरछा में रखा गया। जहां लगभग सभी सदस्य आए। उसी में शामिल होने व अपनी मनपसंद जगह घूमने के लिए मैं भी ओरछा गया। ओरछा जितना सुंदर तस्वीरों में दिखता है, यह सच में उससे भी बहुत सुंदर है। सुंदर कलाकृतियों का गढ़ है ओरछा। अोरछा मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित है। ओरछा की हर पुरानी इमारत एक कहानी कहती है। चाहे वो राजा मधुकर शाह और रानी गणेश कुँवर की हो या फिर स्थानीय देवता हरदौल की। एक कहानी राजसी नृत्यांगना राय प्रवीण की भी है जिसे राजकुमार इंद्रजीत सिंह प्यार करते थे लेकिन उनकी यह कहानी भी अधुरी रह गई। हर कहानी सुनने में बडी दिलचस्प है, जिसे सुनते सुनते आप उस काल में पहुंच जाने का अनुभव करेंगे। अोरछा के सबसे निकटतम शहर झांसी है। ओरछा में देखने व जानने के लिए बहुत कुछ है। एक घुमक्कड या पर्यटक यहां आकर निराश नही होता।

1- ओरछा क्यो जाए?
@ ओरछा का इतिहास बहुत पुराना है। ये बुंदेलों की राजधानी हुआ करती थी। झांसी और ओरछा बहुत पास पास भी है। ओरछा में आप पुरानी इमारतों को देख सकते है। साथ मे जंगल सफारी का आनंद भी उठा सकते है। बेतवा नदी में रिवर राफ्टिंग भी यहाँ होती है। कई प्राचीन मंदिर भी यहां बने है, जिनको देखने आप जा सकते है। और भगवान राम का प्रसिद्ध राम राजा मन्दिर भी यहां है जहां आज भी भगवान राम को राजा के रूप में पूजा जाता है।

2- ओरछा में क्या क्या देखे?
@ओरछा में आप ओरछा का महल, जहाँगीर महल, चतुर्भुज मन्दिर, ओरछा का राम राजा मन्दिर, हरदौल की बैठक, सावन भादो मिनार, बेतवा नदी व रिवर राफ्टिंग, बेतवा नदी के किनारे बनी बुंदेली राजाओ की छतरीयां( समाधी)। साथ में आप ऐतिहासिक व धार्मिक प्रष्ठ भूमी ओरछा की गौरव गाथा सुनने व देखने जा सकते है। आप यहां आकर निराश नही होगे।

3- ओरछा कैसे आए व कहां ठहरे?
@ आप ओरछा यातायात के तीनो साधनो से आ सकते है। अगर आप हवाई जहाज से आ रहे है तो नजदीकी हवाई अड्डा ग्वालियर है जो ओरछा से तकरीबन 125 किलोमीटर की दूरी पर है। अाप रेल के माध्यम से भी आ सकते, आपको झांसी रेलवे स्टेशन उतरना होगा। ओरछा से झांसी केवल 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सडक मार्ग से आप ग्वालियर, दतिया, झांसी होते हुए ओरछा पहुंच सकते है। ओरछा में ठहरने के लिए कई होटल है।

4- अोरछा कब आना चाहिए?
@ वैसे तो आप पूरे साल ओरछा जा सकते है। लेकिन सर्दीयो में ओरछा घुमना सही रहता है क्योकी आप गर्मी से परेशान नही होगे और घुमने का पूरा आनंद लेंगे। वैसे आप बारिश के दौरान भी ओरछा आ सकते है क्योकी इस समय ओरछा में बहुत हरियाली होती है।

5- ओरछा के आसपास और क्या देख सकते है?
@ ओरछा के आसपास आप ग्वालियर शहर जा सकते है।जहां आप सिंधिया पैलेस व ग्वालियर का किला साथ में बहुत सी जगह घुम सकते है। ओरछा के नजदीक झांसी शहर भी है, जहां आप महारानी लक्ष्मीबाई का किला व म्यूजियम भी देख सकते है। ओरछा से आप दतिया भी जा सकते है जहां आप कई किले व पीताम्बरा माता के दर्शन भी कर सकते है।

गनेश द्वार
चतुर्भुज मन्दिर ,ओरछा

राजा राम मन्दिर रात में

राम राजा मन्दिर

मुकेश पांडेय द्वारा
चतुर्भुज मन्दिर के ऊपरी तल पर
वन विहार ओरछा
हम घुमक्कड़ दोस्त
शाम को बेतवा नदी
बेतवा नदी

ओरछा का महल

रिवर राफ्टिंग ( मुकेश पांडेय जी)

बरसुडी एक अंजाना सा गाँव (मेडिकल कैम्प व दिल्ली वापसी) 

इस यात्रा को शरुआत से पढ़ने के लिए यहाँ क्लीक करें। 

अब तक आपने पढा की हम कुछ दोस्त अपने अपने शहरो से बरसुडी गांव आए। हमने यहां पर बच्चो के लिए बरसुडी के स्कूल में एजूकेशन कैम्प लगाया ।

अब आगे… 
14,aug,2017
सुबह आराम से सात बजे उठा । क्योकि आज कैम्प बरसुडी में ही लगाना था। उठते ही मैं पंचायत भवन पहुंचा। यहां पर मुरादाबाद से आए दोस्त योगेश शर्मा जी भी मौजूद थे। कुछ देर हम साथ बैठे रहे । कल व आज की चर्चा चली। फिर मैं वापिस हरीश जी के घर पहुंचा। उन्होने चाय बना दी थी। चाय के साथ उनसे बात होती रही। आज वह नीचे शहर की तरफ जा रहे थे। कल 15 अगस्त है इसलिए स्कूल मे बच्चो को दी जाने वाली मिठाई लेने शहर जा रहे थे। जब मैं स्कूल में पढता था तब हमे भी लड्डू मिला करते थे। वह समय याद आ जाता है कभी कभी। हरीश जी चले गए। हम भी नहा- धौकर पंचायत भवन पहुंच गए। आज यहां पर मेडिकल कैम्प लगाया जाएगा। मेडिकल कैम्प के संचालक के लिए डॉ प्रदीप त्यागी जी व डॉ अजय त्यागी जी को जिम्मेदारी दी गई। यह दोनो ही मुख्य डॉक्टर रहेंगे जो मरीजों की जांच व जरूरी सलाह देंगे। लेकिन गांव के कुछ लोग हिन्दी नही समझते है वह सिर्फ गढ़वाली ही जानते है ऐसे मरीजो के लिए श्री मति शशि जी जो उत्तराखंड की ही रहने वाली है और एक अध्यापिका भी है वह ऐसे मरीजो और डॉक्टर के बीच संवाद कराएगी। दवाई बांटने का जिम्मा मुझ पर व नरेंद्र चौहान जी पर था। लगभग सुबह के 9 बजे हमने बैनर, टेबल पर दवाई लगा कर सारी व्यवस्था कर दी। लेकिन कुछ दवाई जो कल ही आ जानी थी वह किसी कारणवश नही आ पाई। वह दवाई गुमखाल में रखी थी इसलिए पानीपत के सचिन कुमार जांगडा व राजस्थान से आये एक दोस्त रजत शर्मा जी बाईक पर उन दवाइयो को लेने चले गए। 

बरसुडी की सुबहा 
बरसुडी की सुबहा और केले के खेत 
टमाटर 
मेडिकल कैंप का बैनर 
कैंप में आते लोग 
डॉक्टर्स और शशि जी अपना अपना कार्य करते हुए। 
डॉ अजय जी मरीज से वार्ता कलाप करते हुए। 
मेडिसिन 
डॉ. प्रदीप जी मरीजों का इलाज करते हुए। 
बच्चे हो या बूढ़े सभी मेडिकल कैंप में आये। 
हम दोस्तों की एक साथ सेल्फी। 
अमन मल्लिक जी और मैं सचिन 
शशि नेगी जी और मैं सचिन एक सेल्फी में 
मैं और बीनू के चाचा जी( भीम दत्त कुकरेती जी )
गांव के बुजुर्ग कैंप में आते हुए 
बरसुडी आने जाने वाले रास्ते पर लैंड स्लाइड हो गया था हमारे घुमक्कड़ साथियो ने पत्थर हटा कर बाइक के लिए रास्ता बनाया था। उसी पल का एक फोटो। 

हलवाई नें नाश्ते में भरवा कचौडी व चाय बनाई। जिसका स्वाद हम घुमक्कड दोस्त व गांव वासियों ने भी लिया। नाश्ते के बाद सभी को खाने के लिए बेसन के लड्डू भी दिए गए। मरीजो में ज्यादातर संख्या बुजुर्गों की ही थी। हमारे दोनो डॉक्टर  बहुत अच्छी तरह से मरीजों की समस्या को सुन रहे थे व उन्हे जरूरी बातो के अलावा दवाई भी दे रहे थे। कुछ मरीजों को दवाई नहीं मिली थी उनको दवाई घर जाकर देने को भी कहा। मेडिकल कैंप में शामिल होने बहुत से लोग आ रहे थे। जिसको देखकर हम सभी खुश थे। बरसुडी गांव में कोई डॉक्टर या किसी भी प्रकार डिस्पैंसरी नहीं है इसलिए बीनू भाई ने मेडिकल कैंप लगाने की सलाह दी। जिसे आज हम सफल होता देख रहे थे।

आज हमारे बहुत से घुमक्कड़ साथी अपने अपने घर लौट रहे थे। कुछ सुबह ही चले गए थे। कुछ जाने की तैयारी कर रहे थे। बाकी कुछ साथी मेडिकल कैम्प को पूरा करने के बाद कल जाएगे। मै भी तकरीबन 11 बजे बरसुडी से चल पडा। कैम्प अभी जारी रहेगा लगभग तीन बजे तक । मेरे साथ झारखंड से आए एक दोस्त अमन मलिक जी भी चल रहे थे। जिनको मुझे दिल्ली छोडना था। हमसे कुछ आगे मुजफ्फरनगर से आए जावेद जी व राजस्थान से आए कोठारी साहब चल रहे थे। हमारे साथ रामानन्द जी भी चल रहे थे जो अपनी जॉब पर द्वारीखाल जा रहे थे। जब मै वापिस आने से पहले उनसे मिलने उनके घर पर गया तब उन्होने बोला की वह भी द्वारीखाल जा रहे है आप चलो, मैं भी आता हूं। रामानंद जी हमे द्वारीखाल दूसरे रास्ते से ले जा रहे थे जो थोड़ा ऊपर और पेड़ो के बीच से गुजरता है। जिस रास्ते से हम परसो आये थे, वह रास्ता कुछ नीचे साथ साथ चल रहा था। वैसे ऊपर वाले रास्ते पर धूप नही लग रही थी, साथ में शीतल हवा भी लग रही थी। यह रास्ता नीचे वाले रास्ते से बहुत छोटा था मतलब केवल पैदल चलने के लिए ही था। लेकिन बहुत सुंदर था। यहाँ से दूर तक का द्रशय भी दिख रहा था। हम बात करते हुए आगे पीछे चल रहे थे। अब हमें हल्की हल्की चढाई ही मिल रही थी। रास्ते में कुछ मधुमक्खीयो ने मुझे अपना डंक मार दिया। अमन मलिक जी जिनको हम प्यार से दादा कहते है। उन्होंने तुरंत हाथ मे पहने लोहे के छल्ले से उस जगह को रगड दिया।लकिन मुझे अब भी बहुत दर्द हो रहा था लेकिन बाद घर तक पहुंचने पर दर्द सही हो गया था।

अब हम वापिस चल पड़े 
ऊपर चोटी पर भैरव गढ़ी मंदिर है। 
रास्ते के सुन्दर नज़ारे 
रास्ता जो सकून देता है मन को 
रास्ते में एक बच्चा मिला जो अपनी भेड़ बकरियों को चराने लाया हुए था। 
हम ऊपर वाले रास्ते पर थे नीचे भी एक रास्ता है 
ये रास्ते और सुन्दर वादियां 
चीड़ का पेड़ 
जब दादा ने मेरी मदद की मधुमखियो से तो मैंने दादा को चीड़ का यह फूल दिया। 
रामानंद ने ये कसैला फल खिला दिया था मुझे। 
दादा और बरसुडी गांव 

अब हम द्वारीखाल पहुंचे उसी दुकान पर चाय पीने के बाद हम चल पडे। द्वारीखाल से कोटद्वार,  कोट्द्वार से खतौली होते हुए हम दिल्ली पहुंच गए। अमन जी को मैने मैट्रो स्टेशन पर छोड दिया और मैं लगभग रात के 8:30 पर घर पहुंच गया।

यात्रा समाप्त…..

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इस यात्रा के सभी भाग
1 – दिल्ली से बरसुडी 
2 – बरसुडी एजुकेशन कैंप