चोपता तुंगनाथ यात्रा

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तृतीय केदार तुंगनाथ मंदिर, चोपता ,उत्तराखंड 


29 मई 2017

सुबह 5 बजे फोन में अलार्म बज गया। वैसे मैं अलार्म बजने से पहले ही ऊठ चुका था लेकिन बिस्तर नही छोडा था। क्योकी बाहर अभी सर्दी थी और रजाई से बाहर निकलने का मन नही कर रहा था। कुछ देर बाद ललित भी ऊठ गया। मैने ललित को बोला की नहाने व पीने के लिए गर्म पानी ले आ। थोडी देर बाद वह पीने के लिए गर्म पानी ले आया। मुझे सुबह गर्म पानी पीने की आदत है। खैर पानी आ गया पर पीने को मन नही किया। क्योकी पानी में चीड के पेड की लकडी के धुंए की महक आ रही थी। यहां पर लाईट नही है केवल सोलर पावर से ही फोन चार्ज व लाईट को जलाने का जुगाड़ हो पाता है। इसलिए लकड़ियों द्वारा ही नहाने व पीने के लिए पानी गर्म किया जाता है। हम दोनो नहा-धौकर सुबह लगभग 5:40 पर चोपता की तरफ चल पडे।

वैसे बनियाकुंड से चोपता की दूरी लगभग एक किलोमीटर के आसपास ही है इसलिए हमे अपनी कार से वहा तक पहुंचने में कुछ ही मिनट लगे। चोपता में जहां से भगवान तुंगनाथ की यात्रा आरम्भ होती है, उधर पास में ही सड़क किनारे अपनी कार को खडा कर दिया। और एक ढ़ाबे पर सुबह की चाय के साथ बटर ब्रेड खा लिए। साथ में पानी की एक बोतल व कुछ बिस्किट खरीद कर हम चल पडे बाबा तुंगनाथ की यात्रा पर।

तुंगनाथ पंचकेदार में से एक है इन्हे तृतीय केदार माना जाता है। यह मन्दिर लगभग 1000 वर्ष पुराना है लेकिन इस मन्दिर की स्थापना पांडवो द्वारा की गई थी ऐसा बताया जाता है। बाद में किसी ने इसका दोबारा से (जीर्णोद्धार) निर्माण कराया होगा। आपने वह कहानी तो सुनी ही होगी जब पांडवो ने कुरूक्षेत्र में अपने ही गोत्र भाईयो(कौरवों) की हत्या कर युद्ध जीता था। तब पांडवो से भगवान शिव नाराज हो गए और पांडवो को गोत्र वंश हत्या का दोष लग गया। महर्षि वेद व्यास जी के कहने पर पांडव शिव के दर्शन करने केदारखंड आए। केदारखंड मतलब शिव की भूमि जिसे आज हम उत्तराखंड के नाम से जानते है। शिव दर्शन देना नही चाहते थे और पांडव शिव के दर्शन के बिना जाने वाले थे नही। ऐसे में पांडवो ने पूरा केदारखंड घूम लिया। एक दिन शिव का पीछा करते हुए पांडव एक घाटी में पहुंचे जहां पर बहुत से बैल घास चर रहे थे। इन्ही बैलो में भगवान शिव भी बैल का रूप धारण किये हुए थे। महाबली भीम ने शिव को पहचान लिया और शिव रूपी बैल को पकड लिया। शिव रूपी बैल गायब होने लगा। बैल का आगे का हिस्सा नेपाल के पशुपतिनाथ में निकला। केदारनाथ में बैल का ऊपरी भाग। मध्महेश्वर मे नीचे का भाग (नाभि ) तो तुंगनाथ मे भुजा व उदर भाग, रूद्रनाथ में मुंह व कल्पेश्वर में जटांए। बाद में भगवान शिव ने पांडवो को दर्शन दिए व उनको दोष से मुक्त भी किया।

चोपता समुंद्र तल से लगभग 2650 मीटर पर है जबकी तुंगनाथ मन्दिर की ऊंचाई लगभग 3460 मीटर है। तुंगनाथ पंचकेदारो में सबसे ऊंचाई पर बसा शिव मन्दिर है। शीतकालीन मे इस मन्दिर के कपाट बंद हो जाते है क्योकी यहां पर कई फुट बर्फ रहती है। लेकिन कुछ लोग तब भी यहां पर लम्बी ट्रैकिंग करके पहुंच जाते है। अब हम दोनो पैदल ऊपर की तरफ चल पडे। रास्ता पक्का बना हुआ है। शुरू में हल्की चढाई हैं, एक बुग्याल तक। लेकिन बुग्याल के बाद खडी चढाई है। चोपता से तुंगनाथ तक की दूरी लगभग 3 किलोमीटर की है। इस दूरी को तय करने में तकरीबन 2 घंटे लग ही जाते है। बुग्याल तक ललित की हालत खस्ता हो चुकी थी। उसके घुटनो ने जवाब दे दिया और उसने घोडा कर लिया ऊपर तक के लिए। एक घोडा वाला वापसी आ रहा था। उसके पास दो घोडे थे मुझसे भी बहुत कहा की बैठ जाओ पर मै बैठा नही। बाद में घोडे वाले ने कहा की साहब मेरे दोनो घोडे ऊपर जा ही रहे है आप जो दीजिएगा वही ले लूंगा। ललित ने भी कहा की बैठ जाओ जल्दी पहुंच जाएगे। मुझे मजबूरी में बैठना पडा। क्योकी पैदल चलने में जो मजा है वह घोडे की सवारी में नही। खैर हम जल्द ही एक दूकान पर रूके घोडे को चने व गुड खिलाया। घोडे वाले ने बताया की उसकी यह दोनो घोडीयां केदार नाथ त्रासदी में बह गई थी। फिर यह दसवे दिन जंगल में मिली जब यह बहुत कमजोर हो गई थी। ललित भी अपनी केदारनाथ यात्रा के वह पल उसे सुना रहा था। जिसे मैं सुनता चल रहा था।

तुंगनाथ यात्रा प्रवेश द्वार 

बुग्याल (घास का मैदान )
सामने सारी गांव है दूर पहाड़ के नीचे ,जहां से देवरया ताल यात्रा शुरू होती है। 
ललित 
यह सुंदर रास्ते 

पहाड़ो , पेड़ो को निहारता मैं सचिन त्यागी। 

पहाड़ी झोपडी 
ललित

सुबह सुबह हवा में ठंडक थी लेकिन उतनी नही जितना कल शाम लग रही थी। बादलो ने चारो और अपना साम्राज्य फैलाया हुआ था। सुंदर दृश्य बादलो के पीछे छिपे थे। आगे एक दुकान आई जहां से लगभग मन्दिर 1किलोमीटर रह जाता है। कुछ दूरी पर एक गणेश मन्दिर बना है। पास में ही रावण शिला है जहां पर रावण ने तपस्या की थी और भोलेनाथ को प्रसन्न किया था। मन्दिर से तकरीबन 1.5 किलोमीटर ऊपर चंद्रशिला नामक चोटी है। जहां से 360° का पैरोनोमा व्यू दिखता है। चोखम्भा पर्वत तो पूरे रास्ते आपके साथ बना रहता है, मतलब बादल ना हो तो यह दिखता रहता है। मन्दिर से कुछ पहले दो तीन दुकान बनी है। कुछ धर्मशालाए भी है जहां पर यात्री रात में रूक भी सकते है। मन्दिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद ले लिया व एक पंडित जी भी साथ हो लिए पूजा कराने के लिए। मन्दिर में दो कक्ष बने है एक बाहरी कक्ष व दूसरा मुख्य कक्ष जहां पर साक्षात भगवान शिव का वास है। पंडित जी ने बहुत अच्छे से पूजा कराई बाद में हमने उनको दक्षिणा देकर विदा किए।

मन्दिर के पास छोटे छोटे दो तीन मन्दिर और बने है। जिसमे एक मन्दिर पार्वती जी का भी है। कुछ देर बाद कुछ लोग आए जो मन्दिर की विडियो बना रहे थे। उनमे एक थे हैरी रावत जी जिनका यूट्यूब पर एक चैनल है। वह उसके लिए ही विडियो बनाने गाजियाबाद से यहां आए थे। हम मन्दिर के चारो तरफ एक चक्कर लगाते हुए मन्दिर परिसर में ही बैठ गए। यही से एक प्राचीन रास्ता गोपेश्वर के लिए जाता था, जो अब टूटने के कारण बंद कर दिया है। मन्दिर के पीछे बहुत गहरी खाई भी है जिसमे से बादल ऊपर ऊठ रहे थे। मौसम खराब था ऊपर बादल ही बादल थे। इसलिए चंद्र शिला जाना कैंसल कर दिया। अगली बार के लिए छोड दिया। 

कई दुकान पड़ती है रास्ते में ऐसी। थोड़ा सामान महंगा मिलता है बस। 
इसको पारले जी का पूरा पैकेट खिला दिया था। 
दूर चन्द्रशिला चोटी दिखती हुई। 
गणेश मंदिर और उसके पीछे रावण शिला 
गणेश मंदिर और उसके पीछे रावण शिला 

पुराना रास्ता ,,बोर्ड से ही अंदाजा लग रहा है। वैसे थोड़ा चल कर आओ इस रास्ते पर सुंदर दर्शये दिखते है। 
चलो तुंगनाथ मंदिर आ गया। 
घुटने के दर्द के वाबजूद भी मुझ से आगे ललित। 
तुंगनाथ मंदिर व साथ में पार्वती मंदिर ,,साथ में कोहरे का कहर। 
मैं सचिन 
सेल्फी विथ तुंगनाथ टेम्पल 
ललित कुमार 
मंदिर से आगे जाता रास्ता साथ में कोहरा। 
एक अन्य मंदिर 

वापसी के लिए हम नीचे चल पडे। बुग्याल तक पहुंचे और घोडे वाले को ललित ने पैसे दिये और कुछ देर वही घास के हरे भरे बुग्याल में बैठे रहे फिर वापस पैदल नीचे चल पडे। तुंगनाथ का पौराणिक महत्व तो है ही लेकिन यहां का वातावरण इतना सुंदर है की लोग यहां आकर अपने आप को प्रकृति के बेहद करीब महसूस करते है इसलिए ही तो कपाट बंद होने के बाद भी लोग यहां आते रहते है।

चौखंबा पर्वत 
बादलो के परे श्वेत बर्फीले पर्वत। 
वापिस बुग्याल पर। 

नीचे पहुंच कर गाडी में रखे केले खाए गए क्योकी भूख बहुत लग रही थी। ललित के घुटने में दर्द था इसलिए आगे गाडी चलाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली।और चल पडे वापसी हरिद्वार की ओर। हमने वापसी के लिए मक्कू बैंड से दूसरा रास्ता पकड़ लिया। जो कई गांवो से होता हुआ भीरी में मैन सड़क पर मिल गया। भीरी से अगस्त्य मुनि पहुंचे। यहां पर आते वक्त मेने कुछ दवाईयां ली थी लेकिन आज हम बाजार में नही रूके बल्की कुछ दूर आगे चलकर सड़क किनारे गाडी खडी करके मंदाकिनी नदी के किनारे पहुंचे। पानी कल कल करके बह रहा था बहुत ही शांत स्वभाव में, जबकी केदारनाथ त्रासदी के समय इस नदी ने विकराल व प्रचंड रूप ले लिया था। हम दोनो कुछ देर मंदाकिनी नदी के किनारे बैठे रहे। फिर ललित ने एक बोतल मे नदी से जल भरा और गाडी में रख लिया। फिर हम वहां चल पडे। रूद्रप्रयाग पहुंचे और एक होटल पर खाना खाया। फिर देवप्रयाग होते हुए रीशीकेश पहुंचे। यहां पर जाम लगा हुआ था इसलिए नीलकंठ वाले पूल को पार कर के बैराज पहुंचे। इधर कोई जाम नही मिला और शाम तक हरिद्वार पहुंच गए। रात हरिद्वार में बीता कर सुबह एक दो मन्दिर देख कर हम दोपहर बाद अपने घर पहुंच गए।

ललित का दर्द अब कार मुझे चलनी पड़ेगी। हा  हा हा 

वापसी में अगस्त्यमुनि से आगे मंदाकनी नदी के किनारे
वापसी में अगस्त्यमुनि से आगे मंदाकनी नदी के किनारे पर मैं सचिन और  ललित 
धन्यवाद मिलते है अगले सफर पर। …. 

(दिल्ली से दिल्ली यह यात्रा आप तीन से चार दिन में कर सकते है। आप इस टूर में देवरीया ताल भी शामिल कर सकते है)

यात्रा समाप्त.!
पिछली पोस्ट… 
इस यात्रा की सभी पोस्ट। … 
1 – दिल्ली से देवप्रयाग 
2 – देवप्रयाग से चोपता 
3 – चोपता से तुंगनाथ 

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