नाग टिब्बा ट्रेकिंग यात्रा (नाग टिब्बा प्वाइंट व वापसी) 

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26jan2016, tuesday 

सुबह जल्दी ही आंख खुल गई,शायद सुबह के साढ़े पांच बज रहे थे, बाहर किसी की भी बोलने की आवाज नही आ रही थी, इसलिए में टैंट के अंदर ही लेटा रहा, तकरीबन आधा घंटे बाद मैने टैंट छोड दिया, बाहर आया तो देखा, उजाला चारो ओर फैल चुका था, नरेंद्र, पंकज व जांगडा भाई भी ऊठ चुके थे, शायद सब एक दूसरे का ही बोलने का इंतजार कर रहे थे, नीरज के तापमान नापने वाले यंत्र  में देखा तो न्युनतम -5* सैल्सियस तक तापमान रात में नीचे गया था, बाहर हलचल सुनकर नीरज भी बाहर आ गया। कल रात किसी ने बाहर एक चाय के कप में पानी भर कर रख दिया था मेरी नजर उस पर पडी तो देखा की पानी पूरी तरह से जम गया था, लगभग एक इंची सतह ऊपर से पूरी तरह जम चुकी थी, इससे ही सर्दी का अंदाजा लगाया जा सकता था, बस अब की बार बर्फ नही पडी थी, खच्चर वाले ने बताया की पिछले साल यहां पर भी बहुत बर्फ थी, जबकी देवता मन्दिर भी 2600 मीटर की ऊंचाई पर है, फिर भी अब की बार बर्फ यहां नही पडी। चाय पीने का मन कर रहा था, इसलिए आग के पास गए तो देखा अब भी हल्की हल्की आग सुलग रही है, हमने बची हुई सारी लकडी आग पर रख दी ओर देखते ही देखते आग पूरी तरह से जल पडी, आग की गरमी से हाथ पैरौ मे नई जान सी आ गई, पानी की कैन मे देखा तो पानी बहुत कम था ओर एक कैन तो पूरी तरह खाली हो गई है, मै और नरेंद्र व साथ में पंकज जी भी खाली कैन ऊठा कर नाग देवता के मन्दिर की तरफ चल पडे।

थोडी दूर पर यहां के देवता नाग देवता का मन्दिर बना है, मन्दिर के पास ही एक कुंआ(कुंड) सा बना है, जिसमे पानी था, नरेंद्र जी ने कैन को कुएं मे डाला तो देखा की पानी की ऊपरी सतह जमी हुई थी, मैने पास में ही पडी एक लकडी से वो बर्फ की सतह को तोड डाला ओर नरेंद्र ने कैन मे पानी भर लिया। इस कुंड के बारे में मुझे यह पता चला की यह पानी मन्दिर के अंदर से आता है, जब यह कुंड सुख जाता है तब यहां पर लोग नाग देवता की पूजा अर्चना करते है, उन्हे दुध चढाया जाता है, तरह तरह के रंग लगाए जाते है फिर जल चढाया जाता है, पहले पहले तो कुंड मे रंगीन पानी आता है फिर कुछ ही देर में साफ पानी आने लगता है ओर कुंड भर जाता है, ओर यह पानी पीने योग्य होता है। मेरे हिसाब से यह तो एक चमत्कार से कम नही है अगर ऐसे होता है तो।

पानी भरने के बाद हम तीनो वापिस अपने टैंट पर पहुचें, चाय बनाई गई, कल के कुछ पंराठे अभी बचे रखे थे ओर कुछ बिस्किट के पैकेट भी सबने चाय के साथ उन्ही का नाश्ता कर लिया, रात वाला कुत्ता अभी भी हमारे साथ था, उसको भी कुछ खाने को डाल दिया। चाय नाश्ता करने के बाद मुहं हाथ धौकर व सुबह के कुछ ओर जरूरी कामो को निपटा कर हम सब देवता से नाग टिब्बा चोटी की तरफ चलने के लिए तैयार थे। लकिन खच्चर वाला यही रहेगा क्योकी वह अपने खच्चर को यहाँ पर अकेला नही छोड सकता था, क्योकी जो दूसरे लोग थे जो रात को यहां पर रूके थे वो लोग सुबह ही यहां से चले गए थे। खच्चर वाले ने बताया की इस समय हम जंगल मे है, ओर जंगली जानवर भी इस जंगल में मौजूद है, फिलहाल आपको कोई जानवर दिखा ना हो पर पर हो सकता उसने आप को देख लिया हो, उसने बताया की जंगली जानवर वैसे इंसानो से दूर ही रहते है, लेकिन आमना सामना हो जाए तो कुछ कह नही सकते। इसलिये में यही रहुंगा आप लोग ऊपर हो आओ।

हम लोग उसे वही छोड कर नाग टिब्बा की तरफ चल पडे। देवता से तकरीबन दो किलोमीटर की दूरी पर नाग टिब्बा चोटी है, जिसे स्थानीय लोग झंडी भी कहते है, अब रास्ता पूरा तेज चढाई वाला चालू हो गया था, इसलिए जल्द ही सांसे फूलने लगी थी, कही कही बर्फ पडी हुई दिख रही थी, एक जगह हम रूक कर अपनी सांसो को सामान्य कर रहे थे, तो देखा तो बर्फ पर किसी जानवर के पंजो के निशान है, यह निशान हमारी हथेली जितने बडे थे पर अभी हाल मे काफी दिन से बर्फ नही पडी थी इसलिए यह पुराने व गर्मी के कारण कुछ धुंधले हो गए थे, वैसे इस जंगल में भालू और लेपर्ड(तेंदुआ) भी बहुत है। यहां से आगे बढते गए, यह जंगल चीड, बुरांश व अन्य ओर पेडो का है, हम जैसे लोग जो दिल्ली जैसे शहर में रहते है उन्हे ऐसे जगह को स्वर्ग से भी सुंदर लगती है, यह सुंदर व बडी शांत जगह थी। कुछ ही देर बाद हम एक ऐसी जगह पहुचें जहां पर काफी बर्फ पडी थी, इसको पार करने के बाद झंडी(नाग टिब्बा) दिख रही थी, यह इस क्षेत्र का उच्चतम जगह है, गढवाल हिमालय की निचली पहाडियो का उच्चतम जगह । यहां पर पहुचं कर अच्छा लग रहा था, हम लोग इस जगह पर आने के लिए ही तो अपने अपने घर से चले थे, यहां पर आकर एक मुकाम हासिल करने जैसी अनुभुति हो रही थी, बाकी सभी अभी बर्फ के पास ही खेल कुद रहे थे, मै अकेला ऊपर आ गया, कुछ देर वही बैठा रहा, ऊपर हवा बहुत तेज चल रही थी, हवा ठंडक का एहसास करा रही थी। नाग टिब्बा से हिमालय की बडी ऊंची ऊंची बर्फ से ढकी चोटियो का नजारा देखने को मिलता है, पर आज बहुत बादल होने के कारण यह नजारा हमे शायद ही दिखे, नाग टिब्बा से दूसरी तरफ नीचे गया तो यहां पर भी काफी बर्फ पडी थी ओर बहुत से जानवरो के पैरों के निशान बर्फ पर लगे थे, थोडी देर बाद पंकज जी भी ऊपर आ गए, वो भी इस जगह की खूबसूरती की तारिफ कर रहे थे, थोडी देर बाद नीरज मुझे आवाज देने लगा, फिर हम सबने एक फोटो नाग टिब्बा पर एक साथ खिंचवाया। मै बाद मे बर्फ पर फिसलता हुआ नीचे आया, बहुत मजा आया यहां आकर।

तकरीबन एक घंटे से ऊपर हो चुका था हमे ऊपर आए हुए पर किसी का मन ही नही कर रहा था नीचे जाने को, लेकिन हमे आज ही लौटना था ओर पंकज जी की रात को हरिद्वार से ट्रैन भी थी इसलिए हम यहां से चल कर सीधे अपने टैंट पर ही रूके, सारा तामझाम पैक किया ओर खच्चर पर रखवा दिया। ओर चल पडे नीचे गाडी की तरफ। पहाड पर नीचे उतरना भी खतरनाक होता है, इसलिए सावधानी से ही उतरना चाहिए, कही कही शोर्ट कट भी मार कर हम उतर रहे थे। एक जगह नीरज व अन्य ने एक छोटा व तेज ढलान वाला रास्ता पकड लिया। मै ओर जांगडा व पकंज जी एक मैन कच्चे रास्ते पर ही चलते रहे, आगे जाकर हम सब उस छोटे बुग्याल पर फिर मिल गए। जहां पर हमने कल परांठे खाये थे, यहां पर बैठ कर पानी पीया, कुछ खाने को था ही नही इसलिए संजय कौशिक जी के द्वारा दी गई मुंगफली खाई।

कुछ देर बाद यहां से चल पडे, मै, जांगडा व पंकज जी साथ साथ व सबसे पीछे ही चल रहे थे, एक जंगह पंकज जी फिसल गए, पैर मे हल्की सी खरौंच लग गई, एक जगह मेरा पैर रास्ते पर बिखरे पडे पत्थरो पर फिसल गया, जिससे मेरा घुटना दर्द करने लगा, अब मेरी ओर जांगडा की स्पीड एक हो गई थी, मतलब हम सबसे पीछे चल रहे थे, एक जगह जहां पर पानी की टंकी थी वहा थोडी देर रूककर पानी पीया, चले ही थे की तभी वहा पर बने एक घर मे कुछ छोटे छोटे बच्चे खेल रहे थे, वो हमे बॉय बॉय कर रहे थे। हमने रूक कर उन्हे अपने पास बुलाया ओर जिसके पास जो टॉफी बची थी वो उन्हे दे दी, मैने तो उनको दो टमाटो सॉस व हाजमोला के चार पांच पाऊच व जो टॉफी बच रही थी सब दे दी, वे बच्चे इन सब चीजो को पाकर बहुत खुश हुए। हम लोग बच्चो से मिलकर चल पडे, कुछ दूर जाने पर पता चला की मेरा गॉगल(चश्मा) कही गिर गया है, मैने नीरज को बोला की आप चलो मै अभी आया। कुछ दूर जाने पर मेरा गॉगल मिल गया, अब सबसे पीछे मै ही था, दर्द के कारण मे आराम आराम से चल रहा था, कुछ देर बाद मै जांगडा के पास आ गया, तकरीबन आधा घंटे बाद एक जगह हम दोनो आगे जा ही रहे थे की नीरज की आवाज आई की इधर से नही, नीचे जा रही पगडंडी से आओ। नीरज ने बताया की वह हम लोगो की वजह से ही यहां पर बैठा था, कुछ देर बाद हम गाडी पर पहुचं गए, समय लगभग दोपहर के साढ़े तीन बज रहे थे, खच्चर वाले को उसके पैसे दे दिए गए, बाईक पर जांगडा व नरेंद्र चले गए, उनसे यमुना ब्रिज पर मिलने को बोल दिया, बाकी हम गाडी में बैठ कर नीचे पंतवाडी की तरफ चल पडे। पंतवाडी में परमार स्वीट पर पहुचें, वहां से पता चला की नरेंदर ने होटल के खाने पीने का हिसाब चुकता कर दिया है, कुछ घंटो मे यमुना ब्रिज पहुचं गए, वहां से नरेंद्र भी गाडी मे बैठ गया ओर जांगडा साहब अपनी बाईक लेकर अपनी राह चले गए, हम लोग मसूरी की तरफ मुड गए, जहां से हम कैम्पटी फॉल से होते हुए, मसूरी गांधी चौक पर पहुचें, पर यहां पर हम रूके नही ओर सीधा रात को तकरीबन साढ़े नौ बजे हरीद्वार पहुंचे, एक होटल पर खाना खाया ओर शांतिकुंज आश्रम में एक बडा कमरा ले लिया, कमरा लेने के बाद मैं ओर नीरज पंकज जी को रेलेवे स्टेशन पर छोडकर वापिस शांतिकुंज आ गए, जहां पर हम रात गुजार कर सुबह सुबह दिल्ली के लिए चल पडे।

यात्रा समाप्त।

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अब कुछ फोटो देखे जाए इस यात्रा के….

सुबहे उठकर देखा तो पानी जमा हुआ था। 
सुबहें की चाय 
ट्रैकिंग चालू 

दूर से हमारा कैम्प दिखते हुए। 
अब रास्ते पर बर्फ दिखने लगी है। 
एक पेड़ दिखा जो अंदर से जला हुआ था। 
नरेंदर आराम करता हुआ। 
मै सचिन त्यागी रास्ते में आराम करता हुआ। 
पहुँच गए बस। 
हे हे हम पहुँच गए। 
सामने झंडी दिखती हुई। 
लो जी पहुंच ही गया 
नाग टिब्बा पॉइंट 
दूसरी तरफ नाग टिब्बा के 

किसी जानवर  के पैर के निशान।
पंकज, सचिन त्यागी ,जांगड़ा व नीरज जाट। 
वापसी देवता कैंप पर आने के बाद ( पहाड़ियों के पीछे है नाग टिब्बा )

टेंट व अन्य सामान पैक करते हुए 
सब सामान पैक हो गया है। 
चलिए वापसी नीचे की ओर। 

                                                                                      पहुँच गए हरिद्वार। 

                                                                    

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