ख़िरशू से देवलगढ़ व धारी देवी की यात्रा

मेरी केदारनाथ यात्रा
इस यात्रा को शुरुआत से पढ़े
देवलगढ़ मंदिर व धारा देवी मंदिर

गौरा देवी टेम्पल , देवलगढ़ (उत्तराखंड )

01 मई 2018, बुधवार

खिरसू से देवलगढ़ मंदिर तक की दूरी लगभग 18 किलोमीटर है इतनी दूरी कि आप अपनी सवारी से लगभग तीस से चालिस मिनटों में पूरी कर सकते है। और लगभग इतनी ही दूरी श्रीनगर से भी है। जैसे ही हम ख़िरसू से निकले एक महिला ने हमसे लिफ्ट मांगी। उसको श्रीनगर जाना था अपनी बिटिया से मिलने। उसकी बेटी उधर ही पढ़ रही है। हमने बताया कि हम देवलगढ़ जा रहे है उसने कहा कोई बात नही आप देवलगढ़ वाले तिराहे पर उतार देना। उसने बताया कि उसका पति ख़िरसू GMVN गेस्ट हाउस में ही कार्य करता है। उसके तीन बच्चे है एक लड़की दिल्ली में जॉब करती है। बेटा देहरादून में पढ़ रहा है और एक बिटिया श्रीनगर में पढ़ रही है। जिससे वो आज मिलने जा रही है। कुछ ही मिनटों में हमने उसे तिराहे पर छोड़ दिया। और हम बांये तरफ मुड़ गए। यही रास्ता देवलगढ़ जाता है और आगे धारी देवी के पास कल्यासोड़ में मैन रोड पर मिल जाता है। रास्ते में एक गांव का नाम था मंडोली। मैं भी दिल्ली के एक गांव मंडोली से ही हूं। लेकिन यह हमारे गांव की तरफ प्रदुषित नही था। दिल्ली व एनसीआर आज बहुत प्रदुषित हो चुके है। लेकिन इधर ही हवा स्वच्छ थी लेकिन हम इधर रुके नही। फिर आगे देवलगढ़ ही जाकर रुके। हम लगभग सुबह के 9:40 पर इधर पहुँच गए थे।

देवलगढ़ मंदिरों का एक समूह है यहां पर कई मंदिर है मुख्य यहां पर राजराजेश्वरी मंदिर, गोरा देवी मंदिर, काल भैरव का मंदिर व गुफा है। गुफा जो नीचे सड़क के पास ही है। पुराने समय में उत्तराखंड 52 छोटे-छोटे गढ़ो(रियासतों) में बटा हुआ था। इसलिए इसे गढ़वाल भी कहा जाता है। राजा अजय पाल जी ने इन 52 गढ़ो में से 48 गढ़ों को जीतकर अपनी राजधानी चांदपुर गढ़ी से बदलकर देवलगढ़ में बनाई लेकिन फिर 6 वर्षों बाद उन्होंने अपनी नई राजधानी अलकनंदा नदी के किनारे श्रीनगर में बसाई बनाई। वैसे वह गर्मियों में देवलगढ़ रहते थे। और सर्दियों में श्रीनगर।

राज राजेश्वरी मंदिर मंदिर का निर्माण 15 वी शताब्दी में राजा अजय पाल के शासनकाल में कराया गया यह तीन मंजिला मंदिर है, तीसरी मंजिल पर ही मुख्य मंदिर है। यहां पर माता की स्वर्ण मूर्ति व कुछ अन्य प्रतिमाएं भी रखी गई है। यहां पर महाकाली यंत्र, मां कामख्या यंत्र, महालक्ष्मी यंत्र, बगलामुखी यंत्र व श्रीयंत्र भी रखे हुए है। और यहां पर इनकी विशेष पूजा होती है। यहां पर कई सालों से अखंड जोत भी जलती आ रही है। राजराजेश्वरी को शाही परिवार (राज परिवार) व ब्राह्मणों की कुलदेवी माना गया है। इनको तारा देवी, भैरवी, त्रिपुर सुंदरी, धूमावती व मातंगी के नाम से भी जाना जाता है। यह ऐश्वर्य व मोक्ष देने वाली देवी हैं।

गौरा देवी मंदिर भी एक प्राचीन मंदिर है। लेकिन यह तब बना जब यहां पर राजराजेश्वरी मंदिर की स्थापना हो चुकी थी। चूंकि राजराजेश्वरी राजपरिवार की कुलदेवी थी। इसलिए प्रजा के लिए भी गौरा देवी का मंदिर बनवाया गया। गोरा देवी जी को गिरिजा देवी(पार्वती) जी भी कहा जाता है। और यह आसपास के गांव की कुलदेवी है। इनकी बहुत मान्यता है। आज भी वैशाखी के दिन यहां पर बहुत बड़ा मेला लगता है।
राजा का चबूतरा नाम से एक जगह और इधर बनी है कहते है कि इस जगह पर राजा अजय पाल सिंह जी बैठते थे और न्याय करते थे। इसी पर पाली भाषा में कुछ लिखा भी गया है कहते है कि यह उनके न्याय की की कहानियां हैं। मंदिर मुख्य मार्ग से थोड़ा सा ऊपर बना है मंदिर तक जाने के लिए भी दो रास्ते हैं। दोनों ही एक दूसरे के विपरीत बने हैं। मैंने आगे वाले रास्ते से जाना तय किया क्योंकि यह थोड़ा नजदीक था। हम तकरीबन थोड़ा ही ऊपर पहुंचे थे। कि एक पुराना मंदिर हमें देखने को मिला यह गोरा देवी का मंदिर था। यह मंदिर भी आदि शंकराचार्य द्वारा जी के द्वारा ही जीर्णोद्धार किया गया है। यह लगभग केदारनाथ जैसी शैली में ही बना है। मैं इस शैली का नाम तो नहीं जानता कि यह कौन सी शैली में बना है लेकिन लगभग देखने में वही पत्थर वही, चिनाई उसी मुद्रा में खड़ा हुआ है जैसा केदारनाथ। गोरा देवी मंदिर के बाएं तरफ एक छोटा सा मंदिर है शायद वो किसी द्वारपाल का मंदिर होगा और एक उससे थोड़ा सा बड़ा मंदिर थोड़ा सा नीचे दाएं तरफ है इसमें गरुड़ पर बैठे भगवान विष्णु ही हैं। इन मंदिरों को देखकर हम थोड़ा ऊपर चल पड़े थोड़ा सा ऊपर चलने के चलते ही बाएं हाथ पर एक चबूतरा बना हुआ है। उसी के पास एक कुआं है, कुआं थोड़ा ऊपर है। और अब टूट-फूट भी चुका है। इसलिए हम उधर नहीं गए। हम केवल राजा के चबूतरे तक ही गये। यहां से थोड़ा आगे चलकर राजराजेश्वरी मंदिर आ जाता है। थोड़ी सीढ़िया चढ़नी होती है। यहां हमारे अलावा कोई नहीं दिख रहा था। इधर बहुत शांति थी। हवा का शोर गीत गाता सा प्रतीत हो रहा था। पेड़ो के पत्तों की आवाज जो एक दूसरे से टकराने पर बन रही थी। वह भी स्पष्ट सुनाई दे रही थी। थोड़ा आगे चले थे कि एक घर दिखा। उसमें आवाज लगा कर हमने पूछा कि मंदिर कहां पर है? तो उधर से एक पंडित जी आए। मुझे नाम तो पता नही पर शायद नौटियाल जी थे । यह यहां के मुख्य पुजारी है। यह हमें मंदिर के ऊपर के कक्ष में लेकर गए। उन्होंने हमें श्री यंत्र व अन्य मूर्तिया दिखलायी जो मंदिर में बड़े प्राचीन काल से रखी है।उन्होंने बताया कि राजराजेश्वरी माता, राजाओं की कुलदेवी है। और राजा इन्हीं की पूजा करते थे और इनसे ही युद्ध मे विजय और धन व अच्छा राजपाट प्राप्त करने के लिए वर मांगते थे।

मैंने फ़ोटो खींचना चाहा तो पुजारी जी ने मना कर दिया। हम कुछ देर मंदिर में बैठे रहे फिर नीचे उतर आए। यह मंदिर अन्य मंदिरों के तरह नहीं हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि हम मंदिर में है। ऐसा लगता है कि जैसे हम किसी पहाड़ी घर पर है। मतलब मंदिर की बनावट घर जैसी है। यहां आकर मुझे बड़ा अच्छा लगा ऐसा लगा कि कि मैं वाकई में किसी शक्ति के पास हूं । यहां का वातावरण बहुत स्वच्छ व शांतमय था। पुजारी जी भी बड़े सज्जन व सीधे सादे लगे। हमे बड़े आराम से शांति से दर्शन हुए। पुजारी जी का व्यवहार और इस मंदिर का इतिहास जानकर मन खुश हो गया।
तभी मेरा बेटा देवांग जमीन पर गिर गया चोट तो नही लगी पर मेरा छोटा कैमरा टूट गया। जिस कारण देवांग परेशान हो गया। क्योंकि वो कैमरा मैंने उसे ही दे दिया था। और वह अब पूरे ट्रिप पर फ़ोटो नही खींच पाएगा यह सोच कर वह ज्यादा उपसेट था। कुछ ही देर में वह और बच्चों की तरह सब भूल गया और सही भी हो गया। कुछ समय बाद हम नीचे उतर आये और कार में बैठ कर आगे धारा देवी की तरफ चल पड़े।
नीचे सड़क से मंदिर का रास्ता।
देवांग
गौरा देवी मंदिर प्रवेश द्वार
गौरादेवी मंदिर
मंदिर के अंदर
एक अन्य मंदिर
राजराजेश्वरी मंदिर को जाता रास्ता।
राजा का चबूतरा और कुंआ भी दिखता हुआ
राजराजेश्वरी मंदिर
धारा देवी मंदिर (धारी देवी)
हम देवलगढ़ से कल्यासोड़ मात्र आधे घंटे में ही पहुँच गए दूरी लगभग 14 km तय की गई। पिछली बार जब में बद्रीनाथ जी व चोपता गया था। इसी रास्ते से होते हुए गया था लेकिन तब भी धारा देवी के दर्शन नही किये थे। इसलिए अबकी बार दर्शन जरूर करूँगा यह पहले से ही तय कर चुका था। मैंने गाड़ी को नीचे नदी के किनारे ही लगा दिया। और पतले से लोहे के पुल से होते हुए मैन मंदिर में प्रवेश किया। ज्यादातर लोग जमीन पर बैठे हुए थे। और तीन चार पंडे- पुजारी बारी बारी से नीचे बैठे लोगों को बुला रहे थे और बड़े आराम से पूजा करवा रहे थे। हमारा भी नंबर आ ही गया और हमने भी माँ धारा देवी जी की पूजा बड़े आदर से की। इन देवी को उत्तराखंड की रक्षा करने वाली देवी माना गया है। यह हिमालय पुत्री पार्वती माता ही है। कुछ लोगो का मानना है। कि जब डैम बनने के कारण इनको इधर से हटाया गया तो यह गुस्सा हो उठी थी। जिस कारण केदारनाथ में प्रलय आ गयी थी। अब हम मंदिर से बाहर आ गए और अलकनंदा नदी के तट पर भी गए। कुछ देर बाद इधर बिताने के बाद हम आगे सफर पर चल पड़े।

आज हमें फाटा हेलीपैड के आस पास रुकना था क्योंकि हमें कल सुबहें 7 बजे फाटा से हेलिकॉप्टर द्वारा केदारनाथ पहुचना था। कल्यासोड़ से फाटा लगभग 80km की दूरी पर है और यह दूरी तय करने में हमे लगभग 3 से साढ़े तीन घंटे लग ही जायंगे। आगे हम रुद्रप्रयाग रुके इधर एक होटल पर खाना भी खाया और रुद्रप्रयाग से केदारनाथ वाले रास्ते जो की मंदाकनी नदी के साथ साथ चलता है मुड़ गए। रुद्रप्रयाग से एक रास्ता अलकनंदा नदी के साथ साथ बद्रीनाथ जी को चला जाता है। अगस्तमुनि, कुंड व गुप्तकाशी होते हुए हम शाम के लगभग 4 बजे फाटा पहुँच गए। हेलीपैड से कल की पूरी जानकारी ले ली और पास मेंं ही होटल देेेख लिया रुकने के लिए। यह एक नया होटल था फ़िलहाल होटल का नाम भूल गया हूँ, लकिन नंबर मेरे पास है। (9582970010 प्रमोद फाटा ). लकिन हम इसके पहले ग्राहक थे। होटल थोड़ा महंगा मिला 2000 प्रति दिन के हिसाब से क्योंकि चार धाम यात्रा शुरू हो चुकी है और इस दौरान होटल व अन्य सेवाएं महंगी मिलती है। । और हम रात को इधर ही रुक गए…..

रास्ते में कही किसी जगह से दिखता चोखम्बा पर्वत
फाटा
फाटा होटल
फाटा

यात्रा अभी जारी है. …..

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