नाग टिब्बा ट्रेकिंग यात्रा(दिल्ली से पंतवाडी) 

24 jan 2016 ,sunday


सबसे पहले यह बताना जरूरी है की यह नाग टिब्बा क्या है। टिब्बा का मतलब होता है, ऊँची चोटी या जगह। यह एक छोटा ट्रैक है, जो देहरादून के बेहद नजदीक है, नागटिब्बा तक एक पैदल रास्ता देवलसारी से जाता है ओर एक रास्ता पंतवाडी से। हम लोग पंतवाडी से जाने वाले थे, ओर पंतवाडी से नाग टिब्बा तक 10km का पैदल ट्रैक है। नाग टिब्बा समुंद्र तल से लगभग 3022 मीटर ऊंचाई पर स्थित है, यह गढ़वाल क्षेत्र के निचली हिमालय पर्वतमाला की सबसे ऊंची चोटी है, नागटिब्बा को वहा के स्थानीय लोग झंडी कहते है। नाग टिब्बा से तकरीबन दो किलोमीटर पहले नाग देवता का एक मन्दिर भी है।

हम लोगो के वट्सऐप पर दो  घुमक्कड ग्रुप बने है, एक पर नीरज जाट ने नाग टिब्बा पर जाने का कार्यक्रम बनाया तो दूसरे पर बीनू कुकरेती व मनु त्यागी जी ने हर की दून जाने। मेरा मन दोनो जगह जाने का था, पर समय की उपलब्धता को देखकर नाग टिब्बा जाना तय हुआ, क्योकी यह लगभग मेरी पहली ट्रैकिंग थी, इससे पहले मै केवल चकराता स्थित टाईगर फॉल तक ट्रैकिंग करते गया था वो भी लगभग आज से तकरीबन पंद्रह साल पहले, जब टाईगर फॉल तक रास्ता नही बना था, लेकिन वह बीती बात हो गई, इसलिए नाग टिब्बा को ही मै अपनी पहली ट्रैकिंग मानता हुं। 

कार्यक्रम यह बना की हम 24 Jan  को सुबह दिल्ली से चलेगे ओर पानीपत से सचिन जांगडा को लेते हुए, पौंटा साहिब होते हुए, पंतवाडी रूकेगे। जहां से अगले दिन नाग टिब्बा की ट्रैकिंग चालू करेगे। हम नाग टिब्बा जाने वाले तकरीबन 11 सदस्य हो गए थे, पांच हम दिल्ली से जाने वाले थे, जिसमे मै, नीरज व उनकी पत्नी व उनके दो जानने वाले थे, एक हमारे फेसबुक दोस्त सचिन कुमार जांगडा थे, जो हमे पानीपत से मिलने वाले थे, एक सदस्य लखनऊ से आ रहे थे इनका नाम है पंकज मिश्रा जी जो OBC बैंक मे चीफ मैनेजर के पद पर कार्यरत है, यह हमे हरबर्ट पूर से मिलने वाले थे, ओर चार सदस्य अम्बाला से अपनी गाडी से आ रहे थे, इनमे मेरे एक ब्लॉगर मित्र नरेश सहगल भी थे, यह हमे पौंटा साहिब गुरूद्वारा मिलने वाले थे।

मै 24 जनवरी की सुबह 6:15  पर कार सहित नीरज जाट के घर (शास्त्री पार्क) पहुचं गया, ओर जल्द ही हमने अपने बैग व ट्रैकिग का सारा समान गाडी की डिग्गी मे रख दिया, अभी भी हल्का हल्का अंधेरा था, लगभग सुबह के सात बजे हम दिल्ली से निकल पडे, रास्ते में घना कोहरा मिला पर आराम आराम से गाडी चलाते हुए दिल्ली सोनीपत बार्डर पर आ गए, यहां पर नीरज ने जांगडा को फोन मिलाया तो उसने बताया की वह पानीपत टोल टैक्स पर मिलेगा लेकिन साढे दस बजे के बाद मिलेगा। इतने में हमारे एक अन्य मित्र जो सोनीपत  में रहते है, संजय कोशिक जी उनका फोन नीरज के फोन पर आ गया, बोले की रास्ते में घर होकर जाना, बस फिर क्या था चल पडे संजय कोशिक जी के घर चाय पीने के लिए। मैन रोड से थोडा चलने पर ही संजय जी व उनका बेटा हमारा इंतजार करते हुए मिल गए, संजय जी व परिवार के सदस्यो से मुलाकात हुई, यहां पर आकर बहुत अच्छा लगा, संजय जी ने चाय के बाद हमे आगे के सफर के लिए मुंगफली दी, जो आगे हमारे सफर पर बहुत काम आई।

संजय जी से मिलकर हम वापिस पानीपत की तरफ चल पडे। समय लगभग दस बज रहे थे, टोल टैक्स पार कर कार साईड में लगा दी, देखा तो सचिन जांगडा ठंड मे आग तापता मिला, हमने कहां की तुम तो लेट आने वाले थे, फिर जल्दी कैसे आ गए, अपने हंसी मजाक के अंदाज में जांगडा ने नीरज की तरफ इशारा करते हुए कहां की यह बुरा मान जाता इसलिए समय पर आ गया। यहां से सचिन जागंडा मेरे साथ कार मे हो लिया ओर नीरज को सचिन की बाईक चलानी पडी, एक दो जगह रूक रूक कर हम यमुनानगर पहुचें।

 दोपहर के तकरीबन एक बज रहा था, नीरज ने हमे फव्वारा चौक पर रूकने के लिए बोला, जब हम वहां पहुचें तो नीरज के साथ दो ओर अन्य व्यक्ति थे। जिनमे से एक थे दर्शन लाल बवेजा जी जो एक साइंस टीचर है, बवेजा जी नीरज के फेसबुक दोस्त है, उन्होने पास ही रेस्ट्रोरेंट में दोपहर के खाने का इंतजार किया हुआ था, वैसे हम सबने आलू के पराठे ही खाए। खाने के दौरान दर्शन जी ने बताया की यमुनानगर से तकरीबन सत्रह किलोमीटर बाद कालासर जंगल आरंभ होता है, वही मैन रोड पर ही कालेश्वर धाम नाम से एक पुराना शिव मन्दिर पडता है, जहां पर रविवार के दिन हिमालय की जडू- बूटी से निर्मित एक शिव अमृत नामक दवा भी पिलाई जाती है, जिससे किसी भी प्रकार का कैंसर ठीक हो जाता है,  उन्होने बताया की यहां पर स्वंयमभू शिवलिंग है, जब उन्होने हमे इस बारे मे बताया ओर वह स्थान रास्ते मे भी पड रहा है तो हमने वहां पर जाने का कार्यक्रम तय कर दिया।

दर्शन जी से मिलकर हम कालासर की तरफ या कहे की अपनी मंजिल की तरफ चल पडे, सचिन जांगडा ने नरेश सहगल जी को फोन मिलाया तो वह पौंटा साहिब थे, इसलिए हमने उन्हे बता दिया की हम पौंटा साहिब नही आ पाएगे आप सीधा पंतवाडी रूको, वही पर मिलते है आपको। यमुनानगर से कालासर महादेव तक सडक़ सिंगल लेन की है पर बनी सही है, इसलिए थोडी ही देर बाद हम लोग कालेश्वर महादेव मन्दिर पहुचं गए। यहां पर मन्दिर दर्शन किए, वह शिव अमृत बांट रहे एक सन्यासी किस्म  के बाबा जी से भी मिले, उन्ही के पास एक डा० साहब भी बैठे थे, जो लोगो की नब्ज देखकर बीमारी बता रहे थे, फीस कुछ नही ले रहे थे, मन्दिर में भंडारा भी चलता रहता है। पता चला की शिव अमृत नामक दवा कोई भी पी सकता है, सबने थोडी थोडी पी, भंयकर कडवी दवा थी ये, एक शीशी मेने भी रू०160 प्रतिलीटर की दर से खरीद ली, क्योकी यह दवा अन्य आम बीमारीयो में भी लाभकारी है।

मन्दिर से चलकर हम कालेसर जंगल से निकले,यहां पर हमे बहुत बढिया सडक भी मिली गाडी की रफ्तार अपने आप बढ गई, जैसे गाडी खुद कह रही हो की मुझे उडने दो पर मैने गाडी को काबू किया। मै ज्यादातर तेज गाडी नही चलाता हुं। यहां पर रोड के दोनो तरफ बंदर बैठे थे। मैने देखा है की कुछ लोग बंदरो को खाने के लिए कुछ ना कुछ देते है, इस कारण यह बंदर जगंल से बाहर आकर सडक के पास ही रहना चालू कर देते है, कभी कभी रोड पर इनके कारण रोड पर दुर्घटना भी घट जाती है, आगे चलकर हमने सड़क पर कुछ बंदरो के शव भी देखे जो शायद किसी गाडी से टकराकर मारे गए होगें। इसलिए आपसे निवेदन है की आप भी सड़क छाप बंदरो को खाना ना फैके। 

जांगडा ने मन्दिर से अपनी बाईक नीरज से ले ली ओर जगंल के इन खूबसूरत रास्तो पर बाईक चलाने का मजा लेने लगा, हम उसके पिछे पिछे ही चल रहे थे, हमने हरियाणा से हिमाचल मे प्रवेश किया,शायद यहां पर तीस रूपयो की पर्ची कटी। पौंटा साहेब गुरूद्वारा के सामने से निकल कर हम सीधा हर्बटपूर जाकर ही रूके, यहां पर एक चौक पर पंकज मिश्रा हमारा इंतजार करते हुए मिले, उन्होने मुझसे मिलते ही कहां की आप सचिन त्यागी है ना। शायद  उन्होने मेरी एक दो पोस्ट पहले से ही पढी हुई थी, उनका समान कार मे रख दिया, यहां से जांगडा व नीरज के रिश्तेदार नरेंद्र जी बाईक पर बैठ गए ओर हम बाकी पांचो कार में, थोडा चलने पर ही पहाडी मार्ग् चालू हो जाता है, यह देहरादून यमुनोत्री मार्ग है, आगे चलकर इसी रोड पर यमुना ब्रिज पडता है, जहां से थोडा आगे एक रास्ता कैम्पटीफॉल मसूरी के लिए निकल जाता है। यही थोडी देर यमुना ब्रिज पर रूके, यमुना नदी के बेहद करीब जाने का मन था पर जा ना सके, यमुना नदी यहां पर छोटी सी व साफ लग रही थी नही तो दिल्ली मे तो यह काली दिखने लगती है। ब्रिज के पास ही एक चाय की दुकान थी जहां शाम की चाय पी गई, यहीं पर हमने नरेश जी को फोन किया तो पता चला की वह पंतवाडी पहुचं गए है, हमने भी रूकने के लिए तीन कमरे बुक करने के लिए उन्ही से कह दिया, क्योकी फिर हमे वहां जाकर रूम नही ढुंढने पडेगे। थोडी देर बाद यमुना के पुल से चल पडे, यह रास्ता ठीक बना है, कही कही सडक़ निर्माण कार्य भी चल रहा था, यह सडक़ सीधे यमुनोत्री चली जाती है, अब हल्का हल्का अंधेरा हो चुका था, मुख्य सडक पर एक जगह नैनबाग नामक एक छोटा सा बाजार आया, जहां से पंतवाडी के लिए दांहिने हाथ को रास्ता अलग हो जाता है, नैनबाग में भी रूकने को छोटे छोटे होटल बने थे, नैनबाग से पंतवाडी तकरीबन 15kmकी दूरी पर है, कुछ दूर तक सडक ठीक थी लेकिन फिर खराब ही मिली, ओर ट्रैफिक तो था ही नही दो तीन गांव भी पडे इस रास्ते पर, हम  लोग पूरे अंधेरा में ही पंतवाडी पहुचें।

नरेश जी व उनके तीन मित्रो से मुलाकात हुई, उन्होने हमारे लिए एक होटल मे तीन कमरे पहले से ही बुक किये हुए थे, हमारा होटल व उनका होटल के बीच दूरी भी बहुत थी, क्योकी पंतवाडी में ज्यादातर लोगो ने छोटे ही होटल बनाए हुए है, क्योकी यहां पर केवल ट्रैकर ही आते है वो भी हर मौसम में नही, वैसै यहां पर एक गोट विलेज नामक बडा रिजोर्ट बन रहा है।

हम लोग अपना अपना समान अपने रूम पर रख आए, मैने गाडी भी होटल के पास एक बनी  गांव की पार्किग में लगा दी, जहां पर गांव वालो ने जमीन पर पत्थर की औखली बना रखी थी जिसका वह दाल दलने व ओर बहुत सी वस्तुओ को पीसने में प्रयोग पर लाते होंगे। अगले दिन गाडी को  देखकर कुछ गांव  लोगो ने मुझ से कहा की आप यहां तक कार कैसे चढा लाए। क्योकी यह रास्ता एकदम ऊंचाई पर व बेहद पतला ओर ऊपर से कुछ मोड वाला था।

खैर छोडो ये बाते! हम सब अपना अपना समान रख कर एक होटल( होटल परमार) मे बैठ गए, जहां पर नरेश जी ने बताया की वह कल सुबह ही ट्रैक पर निकल पडेगे ओर रात होने से पहले वापिस आ जाएगे, हमने भी अपना कार्यक्रम बता दिया की दोपहर को चलेगे, शाम को नाग देवता मन्दिर के पास अपने टेंट लगा देगे ओर रात वही रूककर सुबह नागटिब्बा जाएगे, ओर फिर घर वापिसी की राह पकडेगे। सबने एक साथ खाना खाया ओर सुबह के लिए क्या क्या पैक करना है यह सब बता कर सोने के लिए अपने अपने कमरो में आ गए।

 यात्रा अभी जारी है …..

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अब इस यात्रा के कुछ फोटो देखे जाए …

युमनानगर से कालासर तक ऐसा रोड था। 
कालेश्वर महादेव मंदिर। 

मंदिर के अंदर का दर्शय 
यही मिलता है शिव अमृत। 

  

कालेश्वर महादेव शिवलिंग। 

माँ पार्वती 
हिमाचल में प्रवेश 
लो जी उत्तराखंड भी आ लिए हम। 
युमना ब्रिज 
सचिन त्यागी 
शाम की चाय (पंकज मिश्रा,  नीरज जाट,  सचिन त्यागी)
युमना नदी 

बरसुडी एक अंजाना सा गाँव (दिल्ली से बरसुडी) 

जैसे जैसे बडा होता गया घुमने की ललक बढती रही। बचपन से हरिद्वार जाता रहा। कभी फैमली के संग तो कभी गांव से कांवरियों को छोडने वाली बस में। फिर ब्लॉग लेखन में आया। यह मेरा अपना शौक था एक जुनून था। हमेशा मन में पहाड ही बसे रहे इसलिए इन पहाडो पर ही घुमता रहा। मन में काफी दिन से मंशा थी की किसी पहाडी गांव पर जाकर कुछ दिन व्यतीत करू। वहा का रहन सहन, खाना पीना देखा जाए। क्योकी अब तक पहाड पर जब भी गया होटल में ही रूका। इसलिए पहाड और वहां के स्थानीय लोगो को व उनका रहन सहन को जान ना सका। एक बार किसी का ब्लॉग पढा जिसमें वह अपने एक दोस्त के गांव गया उसका गांव पहाड पर था। तब से मन में था की कुछ दिन शांति से कही किसी पहाड़ के गांव में रहने जाया जाए।

इसी बीच फेसबुक के माध्यम से बीनू कुकरेती उर्फ रमता जोगी से मुलाकात हुई। यह दिल्ली में रहते है वैसे मूलभूत निवासी उत्तराखंड के है। इनका गांव का नाम बरसुडी है जो की पौड़ी गढ़वाल जिला में आता है। द्वारीखाल से तकरीबन सात किलोमीटर पैदल चलने के बाद इनके गांव पहुंचा जाता है। बरसुडी जाने का पहला अवसर मिला जब हम कुछ घुमक्कड़ दोस्तो ने 2016 में इनके गांव में बच्चो के लिए एजूकेशन कैम्प लगाया था। लेकिन तब मेरा बरसुडी जाना नही हो पाया था। लेकिन इस साल 2017में भी पिछले साल की तरह हम दोस्तो ने बरसुडी में स्कूली बच्चो के लिए एजूकेशन कैम्प व गांव वालो के लिए मेडिकल कैम्प लगाने का कार्यक्रम बनाया। मेरे लिए यह दूसरा अवसर था बरसुडी जाने का जिसे मैं पिछले साल की तरह खोना नही चाहता था।

बरसुडी गांव

बरसुडी गांव एक दुर्गम जगह पर बसा हुआ है। गांव वालो को अपनी प्राथमिक जरूरतो के लिए भी बहुत कष्ट ऊठाने पडते है। अगर गांव में कोई बीमार भी हो जाए तो उसे द्वारीखाल तक या तो पैदल या फिर किसी का सहारा लेकर आना ही पडेगा। देश को आजाद हुए 70 वर्ष हो चुके है लेकिन इस पहाडी गांव तक सड़क नही है। और आप जानते ही है की जहां सड़क नही होती, वहां हर चीज का अभाव रहता है। उत्तराखंड राज्य उत्तर प्रदेश से अलग होकर बना लेकिन फिर भी यहां तक सड़क ना बन सकी। इसलिए गांव के हर घर में युवा अच्छी शिक्षा व रोजगार पाने के लिए गांव छोड शहर में बसता जा रहा है आज इस पलायन की वजह से गांव में अधिकत्तर घर बंद पडे है या फिर बुजुर्ग लोग ही रह रहे है। खेत खलियान जो की कभी हरे भरे रहते थे फसलो से, अब बंजर हुए दिखते है। गांव का हर शख्स पलायन की इस पीडा से त्रस्त है। लेकिन कुछ लोग आज भी है जो अपने गांव में रहते हुए, शहर में नौकरी करते है और खाने मात्र के लिए खेती करते है। इन लोगो से ही यह गांव व इस जैसे अन्य पहाडी गांव चल रहे है। खैर आगे बढ़ते है…

बात यह है की कैम्प की तैयारियों के लिए मुझे भी कार्य सौपा गया। और बीनू जी ने गांव चलने का आग्रह भी किया। बीनू के गांव की खूबसूरती के बारे में अपने दोस्तो से बहुत सुना था व उनके द्वारा बनाई गई फोटो विडियो भी देखी थी। जो की मुझे बरसुडी जाने को कह रहे थे। अब की बार कुछ जाने में काम की अडचने भी आई और एक बार तो मेरा जाना लगभग कैंसिल हो गया। लेकिन कुदरत को यह मंजूर नही था मेरा काम बनता गया और मैं 12 अगस्त को अपने घर से बरसुडी के निकल चला। जयपूर के एक मित्र देवेंद्र कोठारी जी को फोन लगाया। की क्या वह मेरे साथ चलेंगे लेकिन उन्होने बताया की वह अपने एक मित्र के साथ बरसुडी के लिए निकल गए है। मैं अपनी हाल में ही ली गई नई कार को लेकर जा रहा था। यह कार आटोमेटिक गियर प्रणाली पर चलती है इसलिए इसका परीक्षण भी पहाडी रास्तो पर देखना था। फिर मैने अपने एक मित्र को साथ में ले लिया और लगभग हम सुबह के 10:30 पर बरसुडी के लिए निकल चले।

हम गाजियाबाद से होते हुए मेरठ पहुंचे। मेरठ से बिजनौर वाला रूट पकड़ लिया। बिजनौर पार करने के बाद नजीबाबाद फ्लाई ओवर के नीचे मुझे मेरे एक और मित्र मिले जो की अम्बाला से आ रहे थे। इनका नाम है नरेश सहगल जी। यह अपनी बाईक से ही आ रहे थे साथ में इनके एक मित्र भी थे। इन दोनो से मैं पहले भी मिल चुका हूं,  इनका स्वभाग बडा ही मिलनसार है। इनका एक बैग मेने अपनी कार में रख लिया और चल पडे आगे की तरफ। सुबह नाश्ता करके चले थे लेकिन अब दोपहर के लगभग दो बज रहे थे इसलिए एक होटल पर रूक कर हमने खाना खाया। नजीबाबाद से कोटद्वार लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर है। हमें ज्यादा देरी नही लगी वहां पहुंचने में। कोटद्वार शहर उत्तराखंड में आता है। यहां पर हनुमानजी का सिद्धबली नामक मन्दिर एक टीले पर बना है। खोह नदी के किनारे किनारे आगे चल पडे। इसी साल मार्च महिने मैं इधर आया था तब पानी कम था नदी में लेकिन अब बारिश की वजह से नदी में बहुत पानी था।सड़क की हालत कई जगह से बहुत खराब थी क्योकी कुछ दिन पहले इस क्षेत्र में बादल फट गया था जिस कारण नीचले हिस्से में पानी भर गया और सडक़ टूट गई। बहुत सी जगह लैंडस्लाईड भी हो गई थी। लेकिन अब रास्ता साफ हो चुका है। हमे आगे बढने में कोई पेशानी नही हुई। कोटद्वार से आगे दुग्गडा नामक जगह पडती है। यहां पर हमने द्वारीखाल के लिए रास्ता पूछा तो एक व्यक्ति ने बताया की बांये तरफ जाता रास्ता भी उधर चला जाता है लेकिन इधर लोगो की आवाजाही कम है इसलिए आप मैन सड़क से ही गुमखाल होते हुए जाए। हम आगे बढ़ चले कुछ दूर चलने पर एक जगह दो रास्ते हो जाते है। दाहिने तरफ का रास्ता लैंसडौन चला जाता है और बांयी तरफ वाला गुमखाल के लिए। हम बांयी तरफ चल पडे अब चढाई शुरू हो गई थी। मेरी गाडी पहाडो पर चलने में मेरी तरफ से पास हो चुकी थी। पहाडो की बल खाती सड़क बडी सुंदर दिख रही थी। चारो तरफ हरियाली छायी हुई थी।कुछ देर बाद हम गुमखाल पहुंचे।यहां पर कुछ दुकाने बनी थी और एक मन्दिर भी था। गुमखाल से एक रास्ता पौडी को चला जाता है तो दूसरा रास्ता द्वारीखाल होते हुए नीलकंठ और फिर रीशीकेश की तरफ चला जाता है। हम बांयी तरफ जाते रोड पर चल पडे। गुमखाल से द्वारीखाल तकरीबन 13 किलोमीटर की दूरी पर है। हम लगभग शाम के पांच बजे द्वारीखाल पहुंचे।

बिजनोर से पहले गंगा नदी पर बना बैराज 


नजीबाबाद में मेरे साथ नरेश और उनके मित्र
गुमखाल , हमे बाएँ तरफ जाना है। 
अभी सीधे चलना है। 
पहुँच गये द्वारीखाल 

जगह देखकर रोड के किनारे ही गाडी लगा दी।द्वारीखाल की ऊंचाई करीब 1630 मीटर है जबकी बरसुडी करीब 1320 मीटर पर बसा है। यहां से आगे बरसुडी के लिए पैदल ही जाना होगा। वैसे गाडी थोडी आगे चली जाती है, लेकिन अभी कुछ दिन पहले ही बारिश की वजह से लैंडस्लाईड हो गई थी। जिस कारण यह कच्ची रोड बंद हो गई। हम दोनो नें अपने अपने बैग कंधो पर टांग लिए। मैने एक स्थानीय व्यक्ति से बरसुडी तक जाने का रास्ता पूछा। उन्होने रास्ता दिखलाते हुए बताया की आप को इधर से जाना है। तभी एक व्यक्ति हमारे पास आए,  उन्होने मुझसे पूछा की आप बरसुडी जा रहे है कैम्प के लिए। मैने उनको बताया की मैं बीनू कुकरेती का दोस्त हूं और बरसुडी जा रहा हूं। उन्होंने बताया की वह बरसुडी के ही रहने वाले है और गाव के रिश्ते में बीनू के भाई लगते है। वह द्वारीखाल में पोस्टमैन की जॉब करते है। वह भी छुट्टी होने पर बरसुडी ही जा रहे है। आप नए हो कही भटक ना जाओ इसलिए साथ चलने को कह रहा हूं। मैं उनसे मिलकर बडा खुश हुआ क्योकी वह हमारी मदद करने के लिए ही तो आए थे। उन्होने अपना नाम रामानंद कुकरेती बताया। उनकी धर्मपत्नी गांव बरसुडी की प्रधान भी है। हम चल पडे लेकिन मेरे पास नरेश सहगल जी का बैग था वह अभी तक आए नही थे। मैने वहीं पर बने एक कुकरेती होटल वाले से कहा की दो लोग मोटरसाइकिल पर आएगे आप उनसे कह देना की आपका बैग आपके दोस्त ले गए है। तभी मेरी नजर सड़क की तरफ गई तो देखा की नरेश सहगल जी आ रहे है।

नरेश जी हमारे पास आकर मिले फिर हमने वही एक दुकान पर चाय पी। चाय पीने के बाद नरेश जी अपना बैग लेकर बरसुडी के लिए निकल गए। गांव तक बाईक चली जाती है, मगर आराम से नहीं क्योंकी गांव तक रास्ता बहुत ऊबड़-खाबड़ वाला है। खैर हम तीनो चल पडे साथ में एक व्यक्ति भी साथ चल रहे थे जो की भलगांव के रहने वाले थे। भलगांव भी बरसुडी के पास ही है लेकिन इस गांव तक तो रास्ता बरसुडी से भी कठीन है जो मुझे रामानंद जी ने बताया। हम एक पंगडन्डी पर चल रहे थे, नीचे देखने पर कच्ची रोड दिख रही थी और वह लैंडस्लाईड भी जिसकी वजह से यह रोड बंद थी। रोड के नीचे गहरी खाई भी दिख रही थी। पूरा रास्ता हल्की उतराई वाला ही था इसलिए थकावट व सांस फूलने जैसे लक्षण शरीर पर हावी नही हो रहे थे। गांव की सडक़ पर बात हो रही थी क्योकी ग्राम प्रधान का कार्य रामानंद जी ही देखते है। उन्होने बताया की यह सड़क प्रधान मंत्री सड़क योजना के तहत बननी है। कुछ महीने पहले सड़क पर चिन्ह भी लगाए गए लेकिन वास्तविक सड़क कब बनेगी यह पता नही। हम तो उम्मीद ही कर सकते है की सड़क जल्दी बन जाए। अब हम पंगडन्डी छोड थोडी सी बडी कच्ची सड़क पर आ गए। वैसे इसको पंगडन्डी ही कहना उचित होगा। तभी मैं एक दृश्य को देखकर ठहर गया। एक महिला अपने 11 वर्षीय बच्चे को कंधे पर बैठाकर, द्वारीखाल किसी डॉक्टर के पास ले जा रही थी। उस बच्चे के पेट में बहुत दर्द था। मैने अपने बैग में से पेट दर्द की गोली व एक ors का घोल दिया। वह उसे लेकर आगे बढ़ गई। यह दृश्य देखकर मेरा मन भर आया। की यहां के लोगो को एक सडक ना होने से कितना कष्ट उठाना पडता है। और एक शहरी लोग है जो छोटी छोटी जरूरत पूरा ना होने पर आंदोलन कर देते है, ट्रेन रोक देते है, आगजनी कर के सड़क जाम कर देते है।

हम वहां से आगे बढ़ गए अब चीड का जंगल शुरू हो गया। चीड के पेड बहुत लम्बे लम्बे होते है और आग को भी जल्द पकड लेते है। इसलिए लगभग हर वर्ष गरमी में चीड के पेडो में आग लग जाती है और जंगल नष्ट हो जाते है। एक जगह दूर एक गांव दिख रहा था मैने उस गांव को पहचान लिया मैने रामानंद से कहा की यह बरसुडी है ना। रामानंद ने हामी भरते हुए कहा की जी यही बरसुडी है। अब कदम तेज पडने लगे, यह सुंदर रास्ते, कठीन होने के बाबजूद भी अच्छे लग रहे थे। मेरे साथ आया मित्र मुस्तफा यहां पर आकर बहुत खुश था। बरसुडी के सामने वाले पहाड पर बादल नीचे से ऊठ कर चारो और फैल रहे थे। यह नजारा बेहद खूबसूरत लग रहा था। तभी रामानन्द जी ने बताया की नीचे गदेहरा है, वहा से यह बादल ऊठ रहे है। गदेहरा क्या होता है मैने पूछा तो उन्होने बताया की उसमे पानी बहता रहता है और अब तो बहुत पानी है। तब मैं समझा की यह ताजे पानी के नाले को गदहेरा बोल रहे है। अब हम गांव के बाहरी प्रवेश द्वार पर पहुंच चुके थे। हमारा यह सात किलोमीटर का रास्ता कब खत्म हो गया पता ही नही चला।

रामानंद के साथ मैं सचिन त्यागी 
सुन्दर नजारे हर तरफ देखने को मिलते है।
बरसुडी गाँव कि तरफ जाते मुसाफ़िर
बरसुडी कि तरफ 
कुछ देर इसी पेड़ को देखता रहा। 
भलगांव को रास्ता इधर से अलग हो जाता है (जावेद त्यागी )
चीड के जंगल शुरू हो जाते है। 

दूर से दिखता बरसुडी गाँव 
ज़ूम करके देखने पर
वही जाना है 
सीढ़ीदार खेत लकिन बंजर है फ़िलहाल 
लो जी आ गये बरसुडी स्वागत के लिए बैनर लगा हुआ है। 
मुस्तफा जी बहुत खुश है , पहाड़ के उस पर बादलों को देखते हुए। 
गौ माता 

गांव में प्रवेश करते ही हमे बीनू दिख गया। बीनू ने हमारा रहने का इंतजाम अपने चाचा जी (श्री हरीश कुकरेती) जो की प्राथमिक विद्यालय के प्राधानाचार्य भी है उनके घर पर करा दिया। यह भी यहां पर अकेले रहते है बाकी फैमली कही और रहती है। हम लोगो ने कमरे में समान रखा और बीनू के घर की तरफ चल पडे। ऊंचे नीचे रास्ते से होते हुए बीनू के घर पहुंचे। बीनू का परिवार भी दिल्ली में ही रहता है यहां यह घर बंद ही रहता है। बीनू के घर पर ही सभी दोस्तो से मुलाकात हई। कल के प्रोग्राम पर बातचीत हुई। तभी गाजियाबाद के एक दोस्त गौरव चौधरी आ गए उनका रहने का बंदोबस्त भी हमारे कमरे में ही था। फिर हम सब पंचायत भवन पर पहुंचे । यही पर हलवाई लगे हुए थे जो हम सब के लिए खाना बनाएगे। हम लगभग 27 लोग आज बरसुडी पहुंच चुके थे और लगभग 15 लोग कल यहां आने वाले थे। सबसे पहले बारी-बारी परिचय हुआ और परिचय के बाद कल के लिए सबको काम सौंपा गया की किसको क्या जिम्मेदारी उठानी है। बैठक के बाद सबने खाना खाया और अपने अपने कमरो में चले गए। मै और दोनो मित्र कमरे के बाहर बनी बालकनी में बैठे तारो को देख रहे थे। गांव में अंधेरा होने व ऊंचाई होने के कारण यह तारे बहुत नजदीक दिख रहे थे। बाकी हमारे चकाचौंध शहरो में तो अब तारे दिखते ही नही। अब थकावट व नींद असर दिखाने लगी और हम सोने के लिए कमरे में चले गए… 

यही डेरा डालना है तीन दिन के लिए (हरीश कुकरेती जी का घर )
  1. रात्रि घुमक्कड़ सभा 

    यात्रा जारी है। …… 

    आगे का भाग 

    चोपता तुंगनाथ यात्रा

    इस यात्रा को आरंभ से पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

    तृतीय केदार तुंगनाथ मंदिर, चोपता ,उत्तराखंड 


    29 मई 2017

    सुबह 5 बजे फोन में अलार्म बज गया। वैसे मैं अलार्म बजने से पहले ही ऊठ चुका था लेकिन बिस्तर नही छोडा था। क्योकी बाहर अभी सर्दी थी और रजाई से बाहर निकलने का मन नही कर रहा था। कुछ देर बाद ललित भी ऊठ गया। मैने ललित को बोला की नहाने व पीने के लिए गर्म पानी ले आ। थोडी देर बाद वह पीने के लिए गर्म पानी ले आया। मुझे सुबह गर्म पानी पीने की आदत है। खैर पानी आ गया पर पीने को मन नही किया। क्योकी पानी में चीड के पेड की लकडी के धुंए की महक आ रही थी। यहां पर लाईट नही है केवल सोलर पावर से ही फोन चार्ज व लाईट को जलाने का जुगाड़ हो पाता है। इसलिए लकड़ियों द्वारा ही नहाने व पीने के लिए पानी गर्म किया जाता है। हम दोनो नहा-धौकर सुबह लगभग 5:40 पर चोपता की तरफ चल पडे।

    वैसे बनियाकुंड से चोपता की दूरी लगभग एक किलोमीटर के आसपास ही है इसलिए हमे अपनी कार से वहा तक पहुंचने में कुछ ही मिनट लगे। चोपता में जहां से भगवान तुंगनाथ की यात्रा आरम्भ होती है, उधर पास में ही सड़क किनारे अपनी कार को खडा कर दिया। और एक ढ़ाबे पर सुबह की चाय के साथ बटर ब्रेड खा लिए। साथ में पानी की एक बोतल व कुछ बिस्किट खरीद कर हम चल पडे बाबा तुंगनाथ की यात्रा पर।

    तुंगनाथ पंचकेदार में से एक है इन्हे तृतीय केदार माना जाता है। यह मन्दिर लगभग 1000 वर्ष पुराना है लेकिन इस मन्दिर की स्थापना पांडवो द्वारा की गई थी ऐसा बताया जाता है। बाद में किसी ने इसका दोबारा से (जीर्णोद्धार) निर्माण कराया होगा। आपने वह कहानी तो सुनी ही होगी जब पांडवो ने कुरूक्षेत्र में अपने ही गोत्र भाईयो(कौरवों) की हत्या कर युद्ध जीता था। तब पांडवो से भगवान शिव नाराज हो गए और पांडवो को गोत्र वंश हत्या का दोष लग गया। महर्षि वेद व्यास जी के कहने पर पांडव शिव के दर्शन करने केदारखंड आए। केदारखंड मतलब शिव की भूमि जिसे आज हम उत्तराखंड के नाम से जानते है। शिव दर्शन देना नही चाहते थे और पांडव शिव के दर्शन के बिना जाने वाले थे नही। ऐसे में पांडवो ने पूरा केदारखंड घूम लिया। एक दिन शिव का पीछा करते हुए पांडव एक घाटी में पहुंचे जहां पर बहुत से बैल घास चर रहे थे। इन्ही बैलो में भगवान शिव भी बैल का रूप धारण किये हुए थे। महाबली भीम ने शिव को पहचान लिया और शिव रूपी बैल को पकड लिया। शिव रूपी बैल गायब होने लगा। बैल का आगे का हिस्सा नेपाल के पशुपतिनाथ में निकला। केदारनाथ में बैल का ऊपरी भाग। मध्महेश्वर मे नीचे का भाग (नाभि ) तो तुंगनाथ मे भुजा व उदर भाग, रूद्रनाथ में मुंह व कल्पेश्वर में जटांए। बाद में भगवान शिव ने पांडवो को दर्शन दिए व उनको दोष से मुक्त भी किया।

    चोपता समुंद्र तल से लगभग 2650 मीटर पर है जबकी तुंगनाथ मन्दिर की ऊंचाई लगभग 3460 मीटर है। तुंगनाथ पंचकेदारो में सबसे ऊंचाई पर बसा शिव मन्दिर है। शीतकालीन मे इस मन्दिर के कपाट बंद हो जाते है क्योकी यहां पर कई फुट बर्फ रहती है। लेकिन कुछ लोग तब भी यहां पर लम्बी ट्रैकिंग करके पहुंच जाते है। अब हम दोनो पैदल ऊपर की तरफ चल पडे। रास्ता पक्का बना हुआ है। शुरू में हल्की चढाई हैं, एक बुग्याल तक। लेकिन बुग्याल के बाद खडी चढाई है। चोपता से तुंगनाथ तक की दूरी लगभग 3 किलोमीटर की है। इस दूरी को तय करने में तकरीबन 2 घंटे लग ही जाते है। बुग्याल तक ललित की हालत खस्ता हो चुकी थी। उसके घुटनो ने जवाब दे दिया और उसने घोडा कर लिया ऊपर तक के लिए। एक घोडा वाला वापसी आ रहा था। उसके पास दो घोडे थे मुझसे भी बहुत कहा की बैठ जाओ पर मै बैठा नही। बाद में घोडे वाले ने कहा की साहब मेरे दोनो घोडे ऊपर जा ही रहे है आप जो दीजिएगा वही ले लूंगा। ललित ने भी कहा की बैठ जाओ जल्दी पहुंच जाएगे। मुझे मजबूरी में बैठना पडा। क्योकी पैदल चलने में जो मजा है वह घोडे की सवारी में नही। खैर हम जल्द ही एक दूकान पर रूके घोडे को चने व गुड खिलाया। घोडे वाले ने बताया की उसकी यह दोनो घोडीयां केदार नाथ त्रासदी में बह गई थी। फिर यह दसवे दिन जंगल में मिली जब यह बहुत कमजोर हो गई थी। ललित भी अपनी केदारनाथ यात्रा के वह पल उसे सुना रहा था। जिसे मैं सुनता चल रहा था।

    तुंगनाथ यात्रा प्रवेश द्वार 

    बुग्याल (घास का मैदान )
    सामने सारी गांव है दूर पहाड़ के नीचे ,जहां से देवरया ताल यात्रा शुरू होती है। 
    ललित 
    यह सुंदर रास्ते 

    पहाड़ो , पेड़ो को निहारता मैं सचिन त्यागी। 

    पहाड़ी झोपडी 
    ललित

    सुबह सुबह हवा में ठंडक थी लेकिन उतनी नही जितना कल शाम लग रही थी। बादलो ने चारो और अपना साम्राज्य फैलाया हुआ था। सुंदर दृश्य बादलो के पीछे छिपे थे। आगे एक दुकान आई जहां से लगभग मन्दिर 1किलोमीटर रह जाता है। कुछ दूरी पर एक गणेश मन्दिर बना है। पास में ही रावण शिला है जहां पर रावण ने तपस्या की थी और भोलेनाथ को प्रसन्न किया था। मन्दिर से तकरीबन 1.5 किलोमीटर ऊपर चंद्रशिला नामक चोटी है। जहां से 360° का पैरोनोमा व्यू दिखता है। चोखम्भा पर्वत तो पूरे रास्ते आपके साथ बना रहता है, मतलब बादल ना हो तो यह दिखता रहता है। मन्दिर से कुछ पहले दो तीन दुकान बनी है। कुछ धर्मशालाए भी है जहां पर यात्री रात में रूक भी सकते है। मन्दिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद ले लिया व एक पंडित जी भी साथ हो लिए पूजा कराने के लिए। मन्दिर में दो कक्ष बने है एक बाहरी कक्ष व दूसरा मुख्य कक्ष जहां पर साक्षात भगवान शिव का वास है। पंडित जी ने बहुत अच्छे से पूजा कराई बाद में हमने उनको दक्षिणा देकर विदा किए।

    मन्दिर के पास छोटे छोटे दो तीन मन्दिर और बने है। जिसमे एक मन्दिर पार्वती जी का भी है। कुछ देर बाद कुछ लोग आए जो मन्दिर की विडियो बना रहे थे। उनमे एक थे हैरी रावत जी जिनका यूट्यूब पर एक चैनल है। वह उसके लिए ही विडियो बनाने गाजियाबाद से यहां आए थे। हम मन्दिर के चारो तरफ एक चक्कर लगाते हुए मन्दिर परिसर में ही बैठ गए। यही से एक प्राचीन रास्ता गोपेश्वर के लिए जाता था, जो अब टूटने के कारण बंद कर दिया है। मन्दिर के पीछे बहुत गहरी खाई भी है जिसमे से बादल ऊपर ऊठ रहे थे। मौसम खराब था ऊपर बादल ही बादल थे। इसलिए चंद्र शिला जाना कैंसल कर दिया। अगली बार के लिए छोड दिया। 

    कई दुकान पड़ती है रास्ते में ऐसी। थोड़ा सामान महंगा मिलता है बस। 
    इसको पारले जी का पूरा पैकेट खिला दिया था। 
    दूर चन्द्रशिला चोटी दिखती हुई। 
    गणेश मंदिर और उसके पीछे रावण शिला 
    गणेश मंदिर और उसके पीछे रावण शिला 

    पुराना रास्ता ,,बोर्ड से ही अंदाजा लग रहा है। वैसे थोड़ा चल कर आओ इस रास्ते पर सुंदर दर्शये दिखते है। 
    चलो तुंगनाथ मंदिर आ गया। 
    घुटने के दर्द के वाबजूद भी मुझ से आगे ललित। 
    तुंगनाथ मंदिर व साथ में पार्वती मंदिर ,,साथ में कोहरे का कहर। 
    मैं सचिन 
    सेल्फी विथ तुंगनाथ टेम्पल 
    ललित कुमार 
    मंदिर से आगे जाता रास्ता साथ में कोहरा। 
    एक अन्य मंदिर 

    वापसी के लिए हम नीचे चल पडे। बुग्याल तक पहुंचे और घोडे वाले को ललित ने पैसे दिये और कुछ देर वही घास के हरे भरे बुग्याल में बैठे रहे फिर वापस पैदल नीचे चल पडे। तुंगनाथ का पौराणिक महत्व तो है ही लेकिन यहां का वातावरण इतना सुंदर है की लोग यहां आकर अपने आप को प्रकृति के बेहद करीब महसूस करते है इसलिए ही तो कपाट बंद होने के बाद भी लोग यहां आते रहते है।

    चौखंबा पर्वत 
    बादलो के परे श्वेत बर्फीले पर्वत। 
    वापिस बुग्याल पर। 

    नीचे पहुंच कर गाडी में रखे केले खाए गए क्योकी भूख बहुत लग रही थी। ललित के घुटने में दर्द था इसलिए आगे गाडी चलाने की जिम्मेदारी मैंने ले ली।और चल पडे वापसी हरिद्वार की ओर। हमने वापसी के लिए मक्कू बैंड से दूसरा रास्ता पकड़ लिया। जो कई गांवो से होता हुआ भीरी में मैन सड़क पर मिल गया। भीरी से अगस्त्य मुनि पहुंचे। यहां पर आते वक्त मेने कुछ दवाईयां ली थी लेकिन आज हम बाजार में नही रूके बल्की कुछ दूर आगे चलकर सड़क किनारे गाडी खडी करके मंदाकिनी नदी के किनारे पहुंचे। पानी कल कल करके बह रहा था बहुत ही शांत स्वभाव में, जबकी केदारनाथ त्रासदी के समय इस नदी ने विकराल व प्रचंड रूप ले लिया था। हम दोनो कुछ देर मंदाकिनी नदी के किनारे बैठे रहे। फिर ललित ने एक बोतल मे नदी से जल भरा और गाडी में रख लिया। फिर हम वहां चल पडे। रूद्रप्रयाग पहुंचे और एक होटल पर खाना खाया। फिर देवप्रयाग होते हुए रीशीकेश पहुंचे। यहां पर जाम लगा हुआ था इसलिए नीलकंठ वाले पूल को पार कर के बैराज पहुंचे। इधर कोई जाम नही मिला और शाम तक हरिद्वार पहुंच गए। रात हरिद्वार में बीता कर सुबह एक दो मन्दिर देख कर हम दोपहर बाद अपने घर पहुंच गए।

    ललित का दर्द अब कार मुझे चलनी पड़ेगी। हा  हा हा 

    वापसी में अगस्त्यमुनि से आगे मंदाकनी नदी के किनारे
    वापसी में अगस्त्यमुनि से आगे मंदाकनी नदी के किनारे पर मैं सचिन और  ललित 
    धन्यवाद मिलते है अगले सफर पर। …. 

    (दिल्ली से दिल्ली यह यात्रा आप तीन से चार दिन में कर सकते है। आप इस टूर में देवरीया ताल भी शामिल कर सकते है)

    यात्रा समाप्त.!
    पिछली पोस्ट… 
    इस यात्रा की सभी पोस्ट। … 
    1 – दिल्ली से देवप्रयाग 
    2 – देवप्रयाग से चोपता 
    3 – चोपता से तुंगनाथ 

    देवप्रयाग से चोपता(कोटेश्वर महादेव व धारीदेवी) 

    इस यात्रा को शुरू से पढने के लिए यहां क्लिक करें..

    धारी देवी मंदिर 

    28 मई 2017

    देवप्रयाग घुमने के बाद हम वापिस कार पर पहुंचे । मेने सुझाव दिया की यहां से कुछ दूर रूद्रप्रयाग  (67 किलोमीटर) है। आज वही रूक जाएगे और रूद्रप्रयाग के पास ही कोटेश्वर महादेव मन्दिर भी है वह भी देख लेंगे और अगले दिन वापिस चल देंगे। ललित ने भी आगे चलने की स्वीकृति दे दी। हम देवप्रयाग से लगभग दोपहरी के 11:30 पर आगे रूद्रप्रयाग की तरफ चल पडे। पता नही सबको यह महसूस होता है या नही पर मुझे हरिद्वार से निकलते ही और पहाड पर चढते ही बडी अच्छी सी फीलिंग्स आने लगती है। रास्ते मे हमे सिख भाईयो की टोली मिलती रही जो पवित्र धाम हेमकुंड जा रहे थे। रास्ते में कई लोग चार धाम यात्रियों के लिए भण्डारा भी लगाए हुए थे। जल्द ही श्रीनगर पहुंच गए। श्रीनगर उत्तराखंड का एक बडा नगर है। श्रीनगर से लगभग 15 किलोमीटर चलने पर कलियासौड़ जगह आती है। यहां पर माँ धारी देवी का मन्दिर अलकनंदा नदी के किनारे बना है। इन देवी की यहां पर बहुत मान्यता है। ऐसी मान्यता है की यह देवी उत्तराखंड की रक्षा करती है। चार धाम तीर्थों की रक्षा करती है। कहते है की किसी स्थानीय निवासीयो ने नदी में औरत की चीख सुनी। वह नदी के समीप गए तो देखा एक मूर्ति बहती हुई आ रही है। मूर्ति को गांव वालो ने वही स्थापित कर दिया, और अपने गांव के नाम पर ही इन माता का नाम धारी देवी रख दिया।

    अभी कुछ साल पहले से अलकनंदा नदी पर बाँध बनाने का कार्य चल रहा है। जिससे विधुत उत्पादन किया जाएगा।  बाँध की वजह से अलकनंदा नदी के जल स्तर में बढ़ोतरी हुई। जिससे यह प्राचीन मन्दिर डूब क्षेत्र में आ गया। इसलिए 16 जून 2013 को धारी देवी की मूर्ति को उसकी जगह से हटाना पडा। और संयोग से उसी दिन उत्तराखंड में जल प्रलय आ गई। हर जगह बारिश हो रही थी। बादल फट गए थे ग्लेशियर टूट गए थे। जिससे हजारो की संख्या में लोग मारे गए। लोगो को कहना था की धारी देवी नाराज हो गई थी इसलिए यह प्रलय आई। बाकी आज मन्दिर को नया रूप दे दिया गया है। हमने धारी देवी को दूर से ही प्रणाम कर लिया। क्योकी अभी हमे 27 किलोमीटर और आगे रूद्रप्रयाग जाना था। अगली बार जब इधर आऊंगा तब धारी देवी के दर्शन अवश्य करूंगा। 

    श्रीनगर 


    श्रीनगर के पास 



    मैं सचिन त्यागी और धारी देवी मंदिर नीचे दिखता हुआ। 


    सड़क पर मंदिर का प्रवेश द्वार 


    अब हम धारी देवी से तकरीबन 27 किलोमीटर दूर रूद्रप्रयाग की तरफ निकल पडे। लगभग दोपहर के 1:30 हो चुके थे, हम रूद्रप्रयाग पहुंचे। भूख भी जोरो से लग रही थी। ललित ने एक होटल की तरफ इशारा करते हुए बताया की जब वह जून 2013 में केदारनाथ आया था तब इसी होटल में रूके थे खाना खाने के लिए। मेने गाडी उसी होटल की पार्किग में लगा दी। खाने के लिए बोल दिया 60 रू थाली मिली। खाना स्वादिष्ट व सादा ही था। यह होटल अलकनंदा नदी के पास ही था। खाना खाने के बाद होटल के मालिक से रूकने के लिए रूम के लिए पूछा तो उसने 1000 रू बताया। हमने कहां की फिलहाल कोटेश्वर महादेव जा रहे है। वापसी में देखते है शायद आपके यही रूक जाए। अब हम प्रयाग के पास पहुचें । रूद्रप्रयाग मे बद्रीनाथ से आती अलकनंदा नदी व केदारनाथ से आती मन्दाकनी नदी का संगम है। हम नीचे प्रयाग नही गए। हम लोहे के पुल को पार करके बांये तरफ जाते रोड पर चल दिए। यह रोड केदारनाथ की तरफ जाता है। थोडा सा चलने पर ही कोटेश्वर मन्दिर के लिए एक रास्ता दांयी तरफ मन्दाकनी नदी के साथ अलग चला जाता है। हम भी उस तरफ चल पडे। लगभग तीन किलोमीटर चलने पर कोटेश्वर महादेव मन्दिर पहुँच गए। मन्दिर नीचे नदी के किनारे बना है। एक प्राचीन गुफा भी है जिसमे पानी रिसता रहता है और अजीब अजीब सी आकृतियाँ  रूप ले लेती है। जिनको लोग भगवान का नाम व अस्त्रशस्त्र का नाम दे देते है। बाकी यह प्राकृतिक गुफा देखने में बडी ही सुंदर लगती है क्योकी प्रकृति द्वारा बनाई गई हर चीज सुंदर ही होती है लेकिन मनुष्य उनका ज्यादा दोहन कर कर के उनको बर्बाद कर देता है। गुफा में दर्शन करने के पश्चात् हम नीचे मन्दाकनी नदी के समीप गए। कुछ फोटो सोटो लिए और हाथ मुंह धौकर ऊपर आ गए। ऊपर कुछ मन्दिर और भी बने है जिनसे शनीदेव,  हनुमान व शिव की मन्दिर भी है। एक मन्दिर में कुछ भक्त शिव का जल अभिषेक कर रहे थे। हमने भी माथा टेका और मन्दिर से बाहर आ गए। बाकी इस मन्दिर की पौराणिक महत्व पता नही चल पाया। लेकिन यह केदार खंड है मतलब शिव की भूमि तो कुछ ना कुछ इस मन्दिर का महत्व तो जरूर रहा होगा तभी तो लोग यहां पर दर्शन करने आते है। बाकी यह जगह काफी सुंदर है आप वैसे भी यहां आ सकते है  और इस जगह की सुंदरता को देख सकते है।

    रुद्रप्रयाग 


    रुद्रप्रयाग 
    यहाँ से लेफ्ट होना है केदारनाथ वाले रस्ते पर फिर वहा से पोखरी वाले रोड पर मुड़ना है वही से कोटेशवर के लिए रास्ता अलग होता है 
    कोटेश्वर महादेव मंदिर का बाहरी द्वार 


    मंदिर तक जाता रास्ता 


    मंदिर तक जाता रास्ता 


    किसी ने मिट्टी का शिवलिंग बनाया हुआ है 


    मंदिर परिषर 


    मंदिरो के बीच से गुफा तक जाता रास्ता और नीचे मन्दाकनी नदी दिखती हुई 



    गुफा में शिवलिंग 


    रिसते हुए पानी से बनी आकृतियाँ 


    शेषनाग 



    नीचे मंदाकनी नदी ऊपर झूला पुल 


    ललित 


    हम ही है सचिन 


    कुछ देर बाद हम वापिस गाडी पर पहुंच गए और समय देखा तो लगभग तीन बज रहे थे। मैने ललित से कहां की चल चोपता चलते है पास में ही है लगभग 6 बजे तक वहां पहुंच जाएगे। उसने कहां की चलो ठीक है। अब गाडी की कमान ललित ने पकड ली। और चल पडे चोपता की तरफ। हम दोनो तिलवाडा होते हुए अगस्तमुनी पहुंचे। यहां पर महर्षि अगस्त का मन्दिर भी है। लगभग उसी मन्दिर के पास ही बाजार से मेने एक दवाई घर से एक मूव खरीदी। फिर हम आगे चल पडे। भीरी पहुंचने पर हमे तेज बारिश मिली। ललित ने मुझे याद दिलाया की आज 28 मई है और मौसम विभाग ने 28 और 29 को एक चेतावनी जारी की है की उत्तराखंड में तेज बारिश होगी। हम बारिश में चलते रहे और बारिॆश और तेज होती गई। ललित ने मुझसे कहा की वापिस रूद्रप्रयाग चलते है उसने तो एक सिक्के से टॉस भी कर लिया था की आगे जाए या नही। मैने उसे समझाया की हर बार जल प्रलय नही आती। हम उखीमठ रूकेंगे आज। मुझे पता था की वह कुछ डरा हुआ है क्योकी वह 16जून 2013 को केदारनाथ में था जिस दिन केदारनाथ में जल प्रलय आई थी। तब से वह कुछ डरने लगा है पहाडो की बारिश को देखकर। हम दोनो कुंड नामक जगह पहुंचे। यहां पर मैने अपने एक दोस्त संजय कौशिक जी को फोन लगाया की आप ऊखीमठ में कहा रूके थे एक दिन पहले।  उन्होने बताया की वह होटल का नाम नही जानते पर वह पहले चौक के पास ही है। खैर हम आगे बढ गए अब मौसम साफ हो चुका था। दूर अखंड हिमालय की उच्च चोटियां साफ नजर आ रही थी। इतनी साफ की देखते रहने का मन करता है। अब ललित भी खुश था और रास्ते की सुंदरता के मजे ले रहा था। ललित को रास्तो का व जगहो का नाम इतना याद नही रहता। लेकिन चोपता के रास्ते उसको जाने पहचाने लग रहे थे। उसने बताया की वह 16 जून 2013 को इसी रास्ते से चमोली गया था। हम दोनो थोडी देर के लिए मक्कु बैंड पर रूके हमने एक दुकान पर चाय पी और बिस्किट खाए। आगे चलकर हम बनियाकुंड पर रूक गए । हनुमान मन्दिर के ठीक सामने। हमे 800 रू में कमरा मिल गया। यहां पर फोन काम नही कर रहा था इसलिए होटल से चोपता की तरफ चल पडे एक ऊंची जगह पर चढ गए आगे एक कैम्प भी लगा था। यहां पर वोडाफोन के सिग्नल आ रहे थे। घर फोन करके बता दिया की हम हरिद्वार से चोपता आ गए है। और दो दिन बाद घर आएगे। घर फोन करना इसलिए जरूरी था क्योकी हम घर से केवल हरिद्वार बता कर ही आए थे। यहां पर हमे एक परिवार मिला जो देहरादून से आया हुआ था। और कैम्पिंग का पूरा समान लिए हुए थे। लेकिन बारिश की वजह से उनको होटल लेना पडा। उन्होने हमें चाय अॉफर की फिर हम दोनो उनके साथ काफी देर तक बैंठे रहे। ललित भी अपनी केदारनाथ यात्रा के बारे में सुनाता रहा। फिर हम वहां से चल पडे। अब अंधेरा हो चुका था होटल पहुंचते ही हमे खाना मिल गया। अब मौसम में ठंड बढ़ने लगी थी। और हम गर्म कपडे लाए थे नही वो तो मेरे बैग में एक गर्म हाफ जैकेट पडी थी जो मेने पहन ली, ललित को मेने अपनी रेन कोट की जैकेट दे दी। अंदर दोनो ने दो दो टी-शर्ट पहन ली। अब सर्दी कम लग रही थी। खाना खाने के बाद देहरादून वाला परिवार सड़क पर मिला वह कुछ लोग खाना खाने आए थे। उन्होने एक बहुत लम्बी दूरी तक रोशनी फेंकने वाली टार्च ली हुई थी। कह रहे थे की आगे रोड पर जाएगे और जंगली जानवरों को इस टार्च की वजह से देखेंगे। आप को बता दूं  की चोपता व आसपास की जगह केदारनाथ वन अभयारण्य क्षेत्र में आता ।इसलिए भालू, काकड व अन्य जंगली जानवरों का यहां मिलना साामान्य है। लेकिन यह जानवर जहां इंसानी बस्ती व ज्यादा चहल पहल होती है, उधर नही आते है। कुछ स्थानीय लोग जो हमारे पास बैठे थे वह भी हमको भालू के किस्से सुनाने लगे। काफी देर बाद मुझे नींद आने लगी थी और ललित को भी, इसलिए हम सोने के लिए अपने रूम में चले गए……

    चल पड़े मुसाफ़िर ,(रुद्रप्रयाग )


    रुद्रप्रयाग से आगे 


    अगस्तमुनि और मंदिर को जाता रास्ता 


    कुंड से सीधे हाथ पर मुड़ने के बाद ऐसा नज़ारा दीखता रहता है। 



    बनियाकुण्ड में जहाँ हम रुके थे वो होटल (होटल मोनल ) और ललित 


    अखण्ड हिमालय 



    हनुमान मंदिर बनियाकुण्ड ,चोपता 


    चोपता को जाती सड़क 


    देहरादून का परिवार जिन्होंने हमे चाय पिलवाई थी साथ में ललित 


    आग से निकला धुंआ और ढलती सर्द शाम 


    बोन फायर 


    कैंप जहां खाने पिने और रहने का 3500 रुपए लगते है अकेले बन्दे के 


    शिकार और शिकारी 


    चोपता 


    चोपता 


    चोपता 



    पिछला भाग…. 

    आगे का भाग…. 

    १. दिल्ली से देवप्रयाग

    २. देवप्रयाग से चोपता

    ३। चोपता से तुंगनाथ 

    दिल्ली से देवप्रयाग 

    देवप्रयाग ,उत्तराखंड 

    27 मई 2017 

    ललित का कई बार फोन आया की हरिद्वार चलो पर हर बार मैने उसको मना कर दिया। लेकिन एक दिन ( 27 मई 2017)फिर से ललित का फोन आया की उसे मुजफ्फरनगर कुछ काम है, आप भी चलो मेरे साथ और साथ में हरिद्वार भी नहा आएंगे। उस दिन मैं उसको मना नही कर पाया। उसे बोल दिया की अभी सुबह के दस बज रहे है एक घंटे बाद 11 बजे मोहननगर स्थित हिंडन एयर बेस के बाहर गोल चक्कर पर मिलूंगा। मैं लगभग 11 बजे मोहननगर पहुंच गया। थोडी देर बाद ललित भी आ गया। पहले हम सर्विस सैंटर गए जहां से ललित की कार ऊठाई और चल पडे अपने सफर पर। मेरठ पार करने के बाद नावले के पास मैकडोनाल्ड पर बर्गर व कोल्ड ड्रिंक ले ली गई। गाडी मे चलते चलते ही बर्गर का मजा ले रहे थे। रास्ते में ही हरिद्वार की एक धर्मशाला वैदिक योग आश्रम(आन्नद धाम) में एक AC रूम बुक करा दिया। तकरीबन शाम के पांच बजे हम दोनों हरिद्वार पहुंच गए।

    सबसे पहले हम धर्मशाला पहुँचे। वहां पर हमें पांडेय जी मिले बडे ही सज्जन किस्म के व्यक्ति है। कुछ देर बाते होती रही फिर उन्होने रूम दिखा दिया हम सामान रख कर व उनसे यह बोलकर की हम खाना बाहर ही खाकर आएगे,  हरिद्वार के एक घाट पर पहुंच गए। कुछ देर बाद गंगा आरती में भी शामिल होंगे। गंगा जी की आरती देखना व उसमे शामिल होना अपने आप में एक बेहद सुंदर पल होते है। गंगा जी की आरती में शामिल होकर व स्नान करने के बाद हम एक रेस्टोरेंट में खाना खाकर लगभग 8:30 पर वापिस धर्मशाला आ गए। कल हमे वापिस दिल्ली भी लौटना है लेकिन ललित ने कहा की मसूरी चलते है और दो दिन बाद घर लौट चलेंगे। मैने उससे कहा की तू कभी देवप्रयाग गया है उसने कहा की मात्र एक बार ही वह वहा से गुजरा है पर मन्दिर व प्रयाग पर नही गया। मैने कहां भाई मैं भी नही गया हूं इसलिए कल देव प्रयाग निकलते हैं। और हम यह कार्यक्रम बना कर सो गए।

    हरिद्वार स्तिथ आनंद धाम धर्मशाला 


    धर्मशाला संचालक – पांडेय जी व उनकी धर्म पत्नी 


    गंगा आरती 


    खाना खाने के बाद इसका स्वाद लिया गया 

    28 मई 2017

    सुबह लगभग 5:50 बजे नींद खुल गई। जल्दी से फ्रेश होकर व धर्मशाला के लिए कुछ अनुदान देकर हम सीधा गंगा घाट पर पहुंचे। गंगा स्नान कर हम निकल पडे देवप्रयाग की तरफ। लगभग 7:30 पर हम ऋषिकेश पहुंच गए। रास्ते में ही नाश्ता कर लिया गया। अभी ऋषिकेश में जाम नही था नही तो ऋषिकेश में राफ्टिंग वालो की वजह से बहुत जाम लगा रहता है। गर्मियो की छुट्टियों में। चलो हमे जाम नही मिला और हम ऋषिकेश से आगे बढ़ गए। आगे चलकर हमे शिवपुरी पर काफी गाडि़यां खडी मिली। यह सब लोग राफ्टिंग करने व कैम्पिंग करने आए है। लगभग 1200 रूपयो में यह एक व्यक्ति को कैम्पिंग व राफ्टिंग करा देते है। ऋषिकेश से देवप्रयाग तक की दूरी लगभग 75 किलोमीटर है। हम ब्यासी, कौडियाला होते हुए तीन धारा पहुंचे। पिछले साल बद्रीनाथ जाते वक्त हमारी बस यही रूकी थी नाश्ता करने के लिए। यहां पर बहुत से ढ़ाबे है। लेकिन आज हम यहां नही रुकेंगे बल्की सीधा देवप्रयाग जायँगे। देवप्रयाग एक पौराणिक नगर है। यह एक तीर्थ स्थल है। बड़े बड़े ऋषि मुनियों व श्री राम यहाँ पर आए और समय बिताया। देवप्रयाग समुन्द्र की सतह से लगभग 800 मीटर ऊंचाइ पर स्तिथ है। यह उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले में आता है। इस नगर का नाम पंडित देव शर्मा के नाम पर पड़ा जो यहाँ पर सतयुग में आए और भगवान महादेव को अपनी भक्ति से से प्रसन्न किये।

    हम लगभग सुबह के 10 बजे यहाँ पहुँचे। हमे यहाँ पर लगभग पंद्रह मिनट का जाम मिला। जाम से निकल कर हमने सड़क के किनारे जगह देखकर गाडी लगा दी और नीचे मन्दिर व संगम की तरफ चल पडे़। कुछ सीढियों से नीचे उतर कर हम सीधा प्रयाग पर पहुँचे। यह प्रयाग दोनो नदियों के संगम पर बना है एक तरफ हल्के हरे रंग की भागरीथी जो गंगोत्री से आती है तो दूसरी ओर अलकनंदा हल्का श्याम रूप लिये होती है जो बद्रीनाथ से आती है। भगवान बद्रीनाथ का रंग भी श्याम और नदी का भी। दोनो नदियां देवप्रयाग पर मिल जाती है और आगे चलकर गंगा नदी कहलाती है। संगम पर दोनो नदियों का रंग देखा जा सकता है। और इन्हें सास बहू भी कहते है। यहाँ नहाने के लिए एक छोटा सा घाट बना है। जहां पर लोग नहा रहे थे हमने भी हाथ मुंह अच्छी तरह से धौ डाले। फिर वही जल भरने के लिए कैन ली और संगम का जल भर लिया। मैं एक पत्थर पर बैठ गया और संगम के इस मनोहर दृश्य को देख रहा था तभी एक महिला जोर जोर से चिल्लाने लगी। उसके साथ वाले उसे नहाने लगे वह और जोरो से चिल्लाने लगी। वहा मौजूद लोग भूत प्रेत,  ऊपरी पता नही कैसी कैसी बात करने लगे। अब शांत माहौल एक दम बदल गया। हम वहां से चल पडे और थोडा ऊपर रघुनाथ मन्दिर पहुंचे। यह मन्दिर भगवान राम को समर्पित है। मन्दिर में भगवान राम के दर्शन किये। मन्दिर में केवल भगवान राम की ही मूर्ति थी। राम दरबार नही है। मन्दिर के मुख्य पूजारी जी ने हमे प्रसाद दिया और बताया की रावण का वध करने के पश्चात श्री राम को बाह्मण हत्या का दोष लग गया। तब ऋषि मुनियों के कहने पर भगवान राम अकेले संगम पर आए और शिव की अाराधना की और उस दोष से मुक्त हुए। चूंकि राम  यहां पर अकेले आए थे इसलिए मन्दिर में केवल राम की ही मूर्ति है। हम मंदिर से बाहर आ गए। मंदिर के नज़दीक कई मंदिर और बने है। बारी बारी सब मंदिर देख लिए।मंदिर परिषर में ही एक पुजारी मिले जो बद्रीनाथ मंदिर के पुजारी थे। वह बीमार थे इसलिए देवप्रयाग रह रहे है कुछ समय से। उनको कुछ मदद राशि दे कर हम दोनों मंदिर से बाहर आ गए।  और चल पड़े आगे के सफ़र पर ………….

    ऋषिकेश के आस पास की फोटो 


    देवप्रयाग 


    देवप्रयाग संगम स्थल जहां अलकनंदा और भागीरथी मिल जाती है और आगे गंगा कहलाती है 




    मैं सचिन त्यागी देवप्रयाग संगम स्थल पर 


    ललित और मैं 


    अलकनंदा और  भागीरथी 
    रघुनाथ मंदिर तक जाती सीढ़िया 


    रघुनाथ मंदिर ,देवप्रयाग 



     


    एक अन्य मंदिर 
    सड़क से संगम दिखता हुआ 




    अगला भाग ……… 

    इस यात्रा की सभी पोस्ट 

    1- दिल्ली से देवप्रयाग 

    2 – देवप्रयाग से चोपता

    3 – चोपता से तुंगनाथ